राष्ट्र प्रेम और साम्प्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल चन्द्रसिंह “गढ़वाली”

राष्ट्र प्रेम और साम्प्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल चन्द्रसिंह “गढ़वाली”

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

विश्व में शायद ही कोई ऐसा सैन्य विद्रोह हुआ हो जिसमें विद्रोही सैनिकों द्वारा हथियार उठाने के बजाय हथियार गिरा दिये गए हों। ऐसी मिसाल गढ़वाली सैनिकों ने पेशावर में 23 अप्रैल 1930 को पेश की थी। यही नहीं इस काण्ड के नायक चन्द्रसिंह गढ़वाली के नेतृत्व में इन कट्टर हिन्दू विद्रोही सैनिकों ने निहत्थे पठानों पर गोलियां बरसाने के बजाय गोरे सैनिकों के आगे अपने सीने तान लिये थे। विडम्बना देखिये कि बहादुरी के साथ ही राष्ट्र प्रेम और साम्प्रदायिक सौहार्द की ऐसी मिसाल पेश करने वाले वे सभी गढ़वाली सैनिक गुमनामी में खो गये। जबकि नेताओं की यादों को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिये सारे ही देश में नामकरणों की होड़ लगी हुयी है। विद्रोह के नायक चन्द्रसिंह “गढ़वाली” को चुनावी मजबूरी के चलते यदाकदा याद तो किया जाता है, लेकिन उनके वंशजों को ऐसी दो गज जमीन आज नसीब नहीं हो पायी जिसे वे अपना कह सकें और सिर ढकने के लिये एक स्थाई आशियाना बना सकें।

विद्रोह के  कारण “गढ़वाली” की जमीन जायदाद जब्त हो गयी थी। चन्द्रसिंह के उन 32 गुमनाम देशभक्त सैनिकों का तो भारत ही नहीं बल्कि उत्तराखण्ड में भी कोई नाम लेवा नहीं है। 1 अक्टूबर को पेशावर काण्ड के हीरो चन्द्रसिंह “गढ़वाली” की पुण्य तिथि है। इसी दिन 1979 को दिल्ली के एक अस्पताल में वीर चन्द्रसिंह “गढ़वाली” का निधन हो गया था। इस अवसर पर चन्द्रसिंह “गढ़वाली” को तो याद किया ही जाना चाहिये लेकिन उनके साथ ही 2/18 रॉयल गढ़वाल रायफल्स के उन बहादुर सैनिकों को भी अवश्य ही नमन किया जाना चाहिये, जिन्होंने अपने जीवन और नौकरी की परवाह न कर चन्द्रसिंह के आदेश पर 23 अप्रैल 1930 को पेशावर में निहत्थे स्वाधीनता प्रेमी पठानों पर गोली चलाने से इंकार कर दिया था। इस घटना ने सारे देश में स्वाधीनता आन्दोलन में एक नया उन्माद पैदा किया। पेशावर काण्ड सन् 1857 के बाद भारतीय सैनिकों का यह पहला विद्रोह था। मगर विद्रोह भी ऐसा कि किसी पर बंदूक उठा कर नहीं बल्कि बंदूक झुका कर। इस घटना से सारे देश में आजादी के आन्दोलन को नयी स्फूर्ति मिली। भारत से लेकर ब्रितानिया तक गढ़वालियों का नाम हुआ।

मोती लाल नेहरू के आवाहन पर देश के प्रमुख नगरों में गढ़वाली दिवस मनाया गया। इस काण्ड में चन्द्रसिंह एवं अन्य गढ़वाली सैनिकों को मृत्युदण्ड भी मिल सकता था, लेकिन बैरिस्टर मुकुन्दीलाल की जबरदस्त पैरवी से उन्हें फांसी की सजा नहीं हुयी, मगर सारी उम्र कालापानी की सजा अवश्य मिली। अंग्रेजों की गुलामी से हिन्दुस्तान को आजाद कराने की मांग को लेकर 23 अप्रैल 1930 को पेशावर में भारी संख्या में प्रदर्शन कर रहे पठानों पर गोली चलाने के अंग्रेज अफसर के हुक्म की नाफरमानी करने के आरोप में चन्द्रसिंह सहित सभी गढ़वाली सैनिकों पर एबटाबाद (इसी एबटाबाद सैन्य छावनी क्षेत्र में बिन लादेन अमरीकी कमाण्डो द्वारा मारा गया था) में कोर्ट मार्शल की अदालती कार्यवाही चली। जिसमें चन्द्र सिंह “गढ़वाली” को आजन्म कालापानी की सजा, 16 सैनिकों को सख्त लम्बे कारावास की सजा, 9 को नौकरी से बर्खास्तगी की सजा के साथ उनके सारे संचित वेतन को भी जब्त किया गया और 7  अन्य गढ़वाली सैनिकों को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया।

चन्द्रसिंह भण्डारी “गढ़वाली” को जिन्दगी भर कालापानी की सजा के साथ ही उनकी सारी जमीन जायदाद जब्त, हवलदार पद से डिमोशन कर सिपाही का दर्जा और सिपाही पद से भी बर्खास्तगी हुयी। चन्द्रसिंह गढ़वाली के वंशज आज भी देश प्रेम की वह सजा भुगत रहे हैं।1 अक्टूबर , 1979 को वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की मौत के बाद उनके दोनों बेटों आनंद गढ़वाली और कुशलचंद्र गढ़वाली का भी असामयिक निधन हो गया। 21 जनवरी, 1975 को अविभाजित यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवतीनंदन बहुगुणा ने कोटद्वार भाबर के हल्दूखाता गांव से सटी बिजनौर जिले के साहनपुर रेंज में दस एकड़ जमीन 90 साल की लीज पर उन्हें दी है, जिसमें गढ़वाली के बड़े बेटे स्व. आनंद गढ़वाली के परिवार में उनकी विधवा कपोत्री देवी और दो बेटे आलोक और रुपेश गढ़वाली का परिवार रहता है। लीज का नवीनीकरण न होने के कारण उत्तर प्रदेश वन विभाग पूर्व में उन्हें अतिक्रमणकारी घोषित करते हुए जमीन खाली करने का नोटिस थमा चुका है।

उत्तराखंड के जनप्रतिनिधियों के हस्तक्षेप और यूपी के सीएम के संज्ञान में आने के बाद मामला रुक गया, लेकिन परिजन अब उक्त जमीन को अपने नाम पर कराने या उत्तराखंड में जमीन दिलाने की मांग कर रहे हैं। उनकी मांग जायज इसलिये है कि देशप्रेम की मिसाल पेश करने और अदम्य साहस दिखाने पर अंग्रेज सरकार ने चन्द्रसिंह की जमीन जायदाद जब्त कर ली थी। आजादी के बाद तो उनकी जायदाद वापस मिलनी ही चाहिये थी। लेकिन यह सोचने की फुरसत किसको है? 1930 में चन्द्रसिंह गढ़वाली को 14 साल के कारावास के लिये ऐबटाबाद की जेल में भेज दिया गया। जिसके बाद इन्हें अलग-अलग जेलों में स्थानान्तरित किया जाता रहा। पर इनकी सजा कम हो गई और 11साल के कारावास के बाद इन्हें 26 सितम्बर 1941 को आजाद कर दिया गया। परन्तु कम्युनिस्ट होने के कारण उनका गढ़वाल में प्रवेश प्रतिबंधित रहा। जिस कारण इन्हें यहाँ-वहाँ भटकते रहना पड़ा और अन्त में ये वर्धा गांधी के पास चले गये।

गांधी जी इनसे बेहद प्रभावित रहे। 8 अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में इन्होंने इलाहाबाद में रह कर इस आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई और फिर से 3 तीन साल के लिये गिरफ्तार हुए।1945 में इन्हें आजाद कर दिया गया।जिस गढ़वाली ने हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल पेश की थी उसी के गढ़वाल में साम्प्रदायिक तत्व राजनीतिक लाभ के लिये कभी लव जिहाद तो कभी भूमि जिहाद के नाम पर वैमनस्यता फैला रहे हैं। 1947 में आज़ादी मिलने के बाद भी स्वतंत्र भारत में इस योद्धा को अपने साम्यवादी विचारों के कारण कई बार जेल जाना पड़ा।

शर्म की बात है कि आज़ाद भारत में जब उन्हें पहली बार गिरफ्तार किया गया तो वारंट में पेशावर काण्ड करने को उनका अपराध बताया गया था उत्तराखंड के पर्यटन क्षेत्र में स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने वीर चंद्र सिंह गढ़वाली पर्यटन स्वरोजगार योजना की सब्सिडी में दोगुने से अधिक की बढ़ोतरी कर दी है। अब इस योजना में होटल, मोटल, रिजॉर्ट, योग ध्यान केंद्र के लिए सरकार की ओर से अनुदान राशि दी जाएगी। पर्वतीय क्षेत्रों में अब 33 लाख और मैदानी क्षेत्र में 25 लाख तक की सब्सिडी दी जाए।

( लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं )

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