मोटे अनाज (coarse grains) सांस्कृतिक कड़ियों को जोड़ने में भी उपयोगी सिद्ध होंगे

मोटे अनाज (coarse grains) सांस्कृतिक कड़ियों को जोड़ने में भी उपयोगी सिद्ध होंगे

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

स्वतंत्रता के बाद भी किसानों की स्थिति में अपेक्षित रूप से सुधार नहीं हो पाया। इसके कई कारण रहे हैं। इनमें प्रमुख रहीं वे नीतियां, जिन्होंने संसाधनों का दोहन करने वाली खेती को बढ़ावा देकर बड़े किसानों को लाभ पहुंचाया।भारत में कृषि नीति का स्वरूप बेहद खराब रहा है, जिसमें स्पष्ट रूप से गेहूं और चावल पर जोर दिया गया। यह दृष्टिकोण न केवल भौगोलिक रूप से अनुचित है, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से भी प्रतिकूल है, क्योंकि इसमें भूमि, जल और उर्वरक जैसे संसाधनों का भारी दोहन होता है। गेहूं-धान के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी के साथ ही संसाधन-संपन्न खरीद प्रक्रिया और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से वितरण ने बाजार में विकृतियों को जन्म दिया।

हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में यह प्रत्यक्ष रूप से दिखता है, जहां किसानों की पहलीप्राथमिकता ही गेहूं और धान की खेती होती है, जिसे व्यापक रूप से सरकारी खरीद नीति से प्रोत्साहन मिला है। इससे अन्य फसलों की खेती बुरी तरह प्रभावित हुई और कृषि विविधीकरण को आघात पहुंचा है। पंजाब और हरियाणा में विशेष रूप से धान की खेती के पर्यावरणीय दुष्प्रभाव देखने को मिले हैं। इन क्षेत्रों में भूजल स्तर बहुत घटा है, क्योंकि इन फसलों में पानी की बहुत खपत होती है। खेती के इस चलन की एक बड़ी खामी यह भी है कि इससे मुख्य रूप से बड़े किसान ही लाभान्वित होते हैं। चावल और गेहूं के प्रति नीतिगत झुकाव ने इन फसलों के लिए बिजली, उर्वरक और सिंचाई सब्सिडी की उपलब्धता को सुव्यवस्थित किया है। इसके बावजूद एक सवाल यह उठता है कि क्या केवल इन दो फसलों पर हद से ज्यादा ध्यान देने से किसानों का कुछ भला हुआ है। जवाब है-नहीं।

इस प्रकार की परिपाटी ने केवल खेती का ही अहित नहीं किया है, बल्कि लोगों की खानपान की आदतों को भी बदला है, जिसके दुष्प्रभाव सेहत पर स्पष्ट रूप से दिखते हैं। गेहूं और चावल के चलते भारतीयों की थाली से ज्वार, बाजरा और अन्य पोषक खाद्य पदार्थ गायब होते गए। गेहूं और चावल में कार्बोहाइड्रेट की अधिक मात्रा होने से उनका सेवन कई बीमारियों को आमंत्रण दे रहा है। खासतौर से निष्क्रिय जीवनशैली वाले लोगों के लिए यह तमाम जोखिम बढ़ा रहा है। इस कारण मोटापा, मधुमेह और दिल से जुड़ी बीमारियां बढ़ती जा रही हैं। नगरीय क्षेत्रों में बिगड़ती जीवनशैली और सांस्कृतिक परिवर्तनों से यह खतरा और बढ़ गया है।

अच्छी बात है कि सरकार ने इस स्थापित हो चुकी परंपरा को बदलने के प्रयास आरंभ कर दिए हैं। सरकार कृषि विविधीकरण को बढ़ावा दे रही है। कई राज्य भी इसमें केंद्र सरकार के साथ ताल मिलाने के लिए आगे आए हैं। केंद्र सरकार ने मोटे अनाजों को बढ़ावा देने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आह्वान किया है। इन्हीं प्रयासों के चलते इस वर्ष को ‘अंतराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष’के रूप में मनाया जा रहा है। प्रत्येक भारतीय की थाली में मोटे अनाजों की वापसी का विचार भी इस मुहिम के मूल में है। प्रधानमंत्री ने हाल में मोटे अनाजों को न केवल छोटे किसानों के लिए लाभकारी, बल्कि खाद्य सुरक्षा, जीवनशैली से जुड़ी व्याधियों और जलवायु परिवर्तन की चुनौती से मुकाबला करने में बेहद उपयोगी बताया।

उनका मानना है कि मोटे अनाजों की वैश्विक ब्रांडिंग भारत के 2.5 करोड़ छोटे एवं सीमांत किसानों की आजीविका को बड़ा सहारा देगी। इस प्रोत्साहन का ही परिणाम है कि 2018 से मोटे अनाज उत्पादक 12 राज्यों में प्रति व्यक्ति मोटे अनाजों का उपभोग दो से तीन किलो प्रतिमाह से बढ़कर 14 किग्रा हो गया। मोटे अनाजों से मिलने वाले लाभों की सूची बहुत लंबी है। पोषक तत्वों से परिपूर्ण इन खाद्य उत्पादों में प्रोटीन, डाइटरी फाइबर, कई प्रमुख विटामिंस, आयरन, मैग्नीशियम, फास्फोरस और पोटेशियम जैसे कई महत्वपूर्ण खनिज होते हैं। इनका अपेक्षाकृत कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स मधुमेह प्रबंधन में उपयोगी होता है। ये इम्युनिटी बढ़ाकर शरीर को रक्षा कवच भी प्रदान करते हैं। इन्हें पानी की किल्लत वाले शुष्क एवं अर्ध-शुष्क इलाकों में भी उगाया जा सकता है।

पानी के उपयोग की अपनी किफायती प्रकृति के कारण ये पर्यावरण हितैषी भी हैं, जो परिस्थितियों से भली प्रकार अनुकूलित होने की क्षमता रखते हैं। कृषि जैव-विविधता में महत्वपूर्ण योगदान के अलावा ये खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के साथ ही कीटों के हमले और बीमारियों से सुरक्षा में भी सहायक हैं। इससे कुछ फसलों पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिम से बचाव भी संभव है। स्वास्थ्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के कारण इनका सही प्रचार किसानों को प्रीमियम दाम दिलाकर उनका आर्थिक कायाकल्प करने में भी सक्षम है। इनपुट के स्तर पर अपेक्षाकृत कम आवश्यकताओं की वजह से ये खेती के तौर- तरीकों में क्रांतिकारी परिवर्तन कर सकते हैं। अन्य फसलों की तुलना में कीटनाशकों और उर्वरकों की कम जरूरत किसानों पर आर्थिक बोझ घटाएगी और इससे पर्यावरण की रक्षा को बल मिलेगा।

मोटे अनाजों की खेती और उपभोग में नए सिरे से तेजी भारतीय संस्कृति के साथ हमारी कड़ियों को भी जोड़ेगी, क्योंकि ये अनाज सदियों से भारतीय थाली का अभिन्न अंग रहे हैं। कुल मिलाकर, भारतीय कृषि नीति में यह नया रुख-रवैया खेती-किसानी और पोषण के मोर्चे पर नए परिवर्तन की आवश्यकता को मजबूती से रेखांकित करता है। इसलिए अधिक विविधतापूर्ण, टिकाऊ और स्वस्थ भारत की संकल्पना को साकार करने के लिए आवश्यक है कि मोटे अनाजों को दिए जा रहे प्रोत्साहन की गति एवं उत्साह को निरंतर तेजी मिलती रहे। पहाड़ी अनाजों को रोजगार और सेहत दोनों के साथ जोड कर मैंने काम करना इनसे कई तरह के व्यंजन बनाए, लोगों को खिलाया और एक नई रेसिपी तैयार की। पहले लोग कहते थे कि गांव से मंडुवा खाकर आए हैं, क्या देहरादून आकर भी मंडुवा ही खाएंगे। गरीबों का अनाज कहकर जिसका मजाक उड़ाया गया वो अब हर किसी की पसंद बन गया है। ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म पर गेहूं का आटा तकरीबन 50 रुपए किलो तो मंडुवे का 150 रुपए किलो से अधिक कीमत पर मिल रहा है।

मोटे अनाज हमारे भोजन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। कन्नड़ भाषा में पंचरत्न का बड़ा उल्लेख है, ये पंचरत्न हैं-कोदा,कावणी, रागी, सांवा और हरा सांवा। इन पोषक अनाजों के लिए सिंचाई की जरूरत भी कम रहती है। गेहूं और चावल के उत्पादन के लिए जितना पानी साल भर में इस्तेमाल किया जाता है उतने पानी में 25 से 30 तक मोटे अनाज उगाए जा सकते हैं। बच्चों को माता-पिता बचपन से ही अच्छे संस्कार दें ताकि जिससे वे स्वच्छ समाज के निर्माण में अपनी अहम भूमिका निभा सके। जलवायु परिवर्तन और मिट्टी की उर्वरा शक्ति क्षीण होने के दौर में श्री अन्न का महत्व बढ़ जाता है। ये ऐसे अनाज हैं, जिन्हें उपजाने में कम पानी की जरूरत पड़ती है। इनकी फसलें बंजर जमीन में भी बिना मेहनत पनप जाती हैं।

बाजरा, मड़आ, कोदो, सांवा, कोइनी, कुटकी, कंगनी, जौ, लाल धान, दलहन में कुल्थी, अरहर और मसूर के साथ तेलहन में मलकोनी, अलसी एवं तिल जैसे अन्न की खेती के लिए खास उपक्रम की जरूरत नहीं पड़ती है।कोदा-झंगोरा खाएंगे, उत्तराखंड बनाएंगे, उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान बच्चे से लेकर बूढ़ों तक की जुबां पर यह नारा आम था। लेकिन, राज्य गठन के 23 वर्षों बाद प्रदेश में कोदा-झंगोरा मिलना किस कदर मुश्किल हो चला है।

( लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं )

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