उत्तराखंड के विकास और पर्यावरण (Environment) के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है

उत्तराखंड के विकास और पर्यावरण (Environment) के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है

डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

इस दृष्टि से नजर दौड़ाएं तो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 71.05 प्रतिशत वन भूभाग है। प्रकृति की ओर से वन रूपी अमूल्य निधि यहां की सभ्यता, संस्कृति व समृद्धि का प्रतीक है। वन प्राकृतिक सौंदर्य में चार चांद लगाने के साथ ही पर्यावरण को प्रदूषित होने से रोकने के साथ ही जलवायु को संयत रखते हैं। यहां के वन नाना प्रकार की जीवनदायिनी जड़ी-बूटियों का बड़ा भंडार भी हैं। भूमि व जल संरक्षण और वन्यजीवों में वनों की भूमिका किसी से छिपी नहीं है।पर्यावरण संरक्षण में राज्य के योगदान पर चर्चा करें तो आक्सीजन का विपुल भंडार यह राज्य देश को तीन लाख करोड़ से अधिक की पर्यावरणीय सेवाएं दे रहा है। इसमें अकेले वनों की भागीदारी सालाना एक लाख करोड़ रुपये से अधिक है। यही नहीं, राज्य में पर्यावरण का मतलब पर्यटन के जरिये यहां की आर्थिकी से भी जुड़ा है।

दूसरा पहलू ये भी है कि पर्यावरण और विकास के मध्य सामंजस्य का अभाव प्रदेश पर भारी पड़ रहा है। इस परिदृश्य के बीच राजनीतिक दलों के बीच पर्यावरण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे की अनदेखी को किसी भी दशा में ठीक नहीं कहा जा सकता जैव विविधता के लिए समृद्ध उत्तराखंड में पर्यावरण का महत्व ईको टूरिज्म से भी है, जो यहां की आर्थिकी से जुड़ा विषय है। मैदान, पहाड़ और उच्च हिमालयी क्षेत्र के भूगोल को स्वयं में समेेटे राज्य के जंगलों, संरक्षित क्षेत्रों और उच्च हिमालयी क्षेत्र में प्रकृति से छेड़छाड़ किए बगैर पर्यटन गतिविधियों यानी ईको टूरिज्म पर जोर दिया जा रहा है। इसके सार्थक परिणाम भी आए हैं। वन्यजीव पर्यटन के लिए कार्बेट टाइगर रिजर्व आज भी विश्वभर के सैलानियों की पहली पसंद है तो उच्च हिमालयी क्षेत्र हमेशा से पर्वतारोहण व टै्रकिंग के लिए आकर्षण का केंद्र है। इसके साथ ही अन्य संरक्षित क्षेत्रों, आरक्षित वन क्षेत्रों, वन पंचायतों में ईको टूरिज्म ने नई संभावनाओं के द्वार खोले हैं। उत्तराखंड में पर्यावरण का संरक्षण यहां की परंपरा का हिस्सा है। एक दौर में लोग वनों से अपनी जरूरत पूरी करने के साथ ही जंगलों को पनपाने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाते थे। वर्ष 1980 में वन अधिनियम के अस्तित्व में आने के बाद वनों से मिलने वाले हक-हकूक पर आरी चली तो वन और जन के प्रगाढ़ रिश्तों में कुछ खटास भी आई है। बावजूद इसके जंगलों का संरक्षण राज्यवासियों की प्राथमिकता से दूर नहीं हुआ है। इसी का सुखद परिणाम है कि राष्ट्रीय पशु बाघ और राष्ट्रीय विरासत पशु हाथी के संरक्षण में राज्य अग्रणी भूमिका निभा रहा है।

ऐसी ही स्थिति दूसरे वन्यजीवों के मामले में है, वह भी तब जबकि हर साल वन्यजीवों के बढ़ते हमले चिंता का सबब बने हैं। उत्तराखंड में ऐसी नीतियों की आवश्यकता है, जो पर्यावरण संरक्षण में सहायक सिद्ध हों और विकास का पहिया भी निरंतर चलता रहे। इसके लिए जरूरी है कि पर्यावरण और विकास में बेहतर सामंजस्य स्थापित किया जाए। पारिस्थितिकी और आर्थिकी को साथ जोड़कर देखना होगा। समझना होगा राज्य की बेहतरी के लिए ये दोनों ही आवश्यक हैं और इसी को ध्यान में रखते हुए हर स्तर पर आगे बढ़ना होगा। देश में जन आंदोलनों का एक संवृद्ध इतिहास रहा है। इनमें पर्यावरण को लेकर हुए आंदोलन भी शामिल हैं। उत्तराखंड में चंदी प्रसाद भट्ट और सुंदर लाल बहुगुणा के नेतृत्व में हुए अहिंसात्मक चिपको आंदोलन पचास साल पूरा कर रहा है। एक बार फिर से जंगल को बचाने के लिए हुए इस आंदोलन की चर्चा हो रही है.इतिहासकार शेखर पाठक ने अपनी चर्चित किताब च्हरी भरी उम्मीद चिपको आंदोलन और अन्य जंगलात प्रतिरोधों की परंपराज् में लिखा है कि उत्तराखंड के चमोली जिले में अंगू की लकड़ी नाम मात्र की कीमत पर इलाहाबाद की सायमण्ड कंपनी को दी गई थी, लेकिन उन पेड़ों के पास रहने वाले और सदियों से उनकी हिफाजत तथा संतुलित इस्तेमाल करने वाले गरीब किसानों को नहीं चमोली जिले में दशौली ग्राम स्वराज्य संघ (1964) के सर्वोदयी कार्यकर्ता चंडी प्रसाद भट्ट इसके खिलाफ आंदोलन कर रहे थे। इससे पहले जुलाई 1970 में अलकनंदा में आई भीषण बाढ़ ने लोगों को अपने पर्यावरण की रक्षा के प्रति अतिरिक्त रूप से सचेत कर दिया था।  जब 27 मार्च 1973 को अंगू के पेड़ों को काटने कंपनी के मजदूर गोपेश्वर आए तब भट्ट ने कहा था:उसमे कह दो कि हम उन्हें पेड़ काटने नहीं देंगे,पाठक लिखते हैं कि भले ही प्रतिरोध की यह अनूठी बात भट्ट के मुख से निकली, पर थी सामूहिक अभिव्यक्ति. इस अभिव्यक्ति ने आने वाले वर्षों में जन आंदोलन का रूप लिया और देश-दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा।  चिपको आंदोलन के संगठन और नेतृत्व के लिए वर्ष १९८२ में रमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित 89 वर्षीय भट्ट कहते हैं कि आज समस्याएं और भी गंभीर हो रही है। बात पेड़ की ही नहीं, पानी की, जमीन की समस्या की भी है। अलग-अलग ढंग से संरक्षण की बात ऊपर ही ऊपर तो हो रही है, जमीनी स्तर पर जिस तरह काम होना चाहिए नहीं हो रही। चिपको आंदोलन की चर्चा व्यापक स्तर पर हुई।

सुंदर लाल बहुगुणा और चंडी प्रसाद भट्ट इसके नेता के रूप में उभरे, पर रेणी के जंगल बचाने की मुहिम में 26 मार्च 1974को महिला मंगल दल की अध्यक्ष, गौरा देवी के साथ इक्कीस महिलाओं और सात बच्चियाँ के हिस्से प्रतिरोध का जिम्मा आया था, जब कंपनी के मजदूर पेड़ काटने पहुंचे थे। पाठक इसे च्इतिहास का असाधारण क्षणज् कहते हैं।  रेणी गांव से आंदोलन की लहर अन्य जिलों में पहुंची. बाद में70 के दशक में चिपको का बहुचर्चित नारा क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार/ मिट्टी, पानी और बयार, जिंदा रहने के आधारज् सुनाई दिया। हालांकि पाठक अपनी किताब में नोट करते हैं कि उत्तराखंड में पिछले सौ सालों में जंगल हमेशा आंदोलन का विषय रहे हैं। वे लिखते हैं कि जंगलात सत्याग्रह के दौरान च्शक्तिज् जैसे पत्र में वर्ष 1924 में ही जंगलों को हवा, मिट्टी, पानी का स्रोत बताया जाने लगा था।  बहरहाल, यह पूछने पर कि पचास साल बाद चिपको आंदोलन को वे किस रूप में याद करते हैं, भट्ट ने बताया कि च्जहां तक पेड़ों की बात है सरकार के कानूनों के कारण अभी काफी बचे हैं और कुछ लोगों की जागृति के कारण। मुख्य रूप से उत्तराखंड में महिला मंगल दलों के द्वारा अपने इलाकों में पेड़ों की निगरानी का कार्यक्रम चल रहा है। चिपको आंदोलन की जो मातृसंस्था है वह जंगलों में आग इत्यादि में जन चेतना जागृत करने का काम कर रही है। निस्संदेह चिपको आंदोलन की एक प्रमुख सफलता वर्ष 1980 में बना वन संरक्षण अधिनियम है।

चिपको आंदोलन ने70-80 के दशक में देश में जल, जंगल जमीन को लेकर होने वाले अन्य संघर्षों को प्रभावित किया.२१वीं सदी में आज सबसे ज्यादा च्जलवायु परिवर्तन पर्यावरण विमर्शों में हावी है। अकारण नहीं कि पहली बार वर्ष 2019 चुनावों में प्रमुख राजनीतिक दल के चुनावी घोषणा पत्रो में जलवायु परिवर्तन का मुद्दा दिखाई दिया। उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन के कारण केदारनाथ में वर्ष 2013 में हुई त्रासदी की याद ताजा है, जिसमें सैकड़ों लोगों की जान गई। इसकी मुख्य वजह ग्लेशियर का पिघलना, मंदाकिनी नदी का जलस्तर बढ़ना माना गया। खुद भट्ट केदारनाथ के साथ वर्ष 2021में तपोवन में ग्लेशियर के टूटने से जानमाल की तबाही की ओर इशारा करते हैं। वे जोशीमठ का उदाहरण देते हैं और विस्थापन का जिक्र करते है। वे कहते हैं कि सवाल है कि जोशीमठ को कैसे बचाएं? वे जोर देकर कहते हैं कि हिमालय में गड़बड़ी होगी तो पूरे बेसिन पर दुष्प्रभाव पड़ेगा और ग्लेशियर तेजी से पिघलेंगे। वे आगाह करते हैं कि एक समय ऐसा आएगा हमारी गंगा बरसाती नदी की तरह हो जाएगी। आजादी के बाद भारत में पर्यावरण को आर्थिक विकास के बरक्स खड़ा किया जाता रहा है। उदारीकरण के बाद यह द्वंद्व गहराया है। उपभोग की संस्कृति और फैली है, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और बढ़ा है। पर जैसा कि शेखर पाठक ने लिखा है कि च्जलवायु परिवर्तन के दौर में जंगलों की महत्ता और बढ़ेगी. इसलिए आने वाली सदियों में भी जंगल आर्थिकी और पारिस्थितिकी के आधार होंगे। वे लिखते हैं चिपको आंदोलन की महत्ता आर्थिकी और पारिस्थितिकी के संतुलित समन्वय में था। चिपको आंदोलन से यह सीख लेकर हम भविष्य की ओर देख सकते हैं। समय आ गया है कि मनुष्य अपनी इस गलती को सुधारे और सतत विकास के लक्ष्य को साकार करते हुए पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान केंद्रित करे ताकि धरती के साथ-साथ हमारी आने वाली पीढ़ियां भी शुद्ध हवा में सांस ले सके।  लेखक दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं।

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