उत्तराखंड : वैडिंग डेस्टिनेशन सरकार के लिए सिरदर्द 

उत्तराखंड : वैडिंग डेस्टिनेशन सरकार के लिए सिरदर्द 

डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

देश में शादियों का सीजन शुरू हो गया है। इस साल देशभर में 38 लाख शादियां होनी हैं। ऐसे में हर किसी का सपना होता है कि वो अपनी होने वाली जीवनसाथी के साथ सुदूर देश हो या फिर विदेश में या सात समुंद्र पार किसी खूबसूरत जगह पर शादी के बंधन में बंधे जिससे इस पल को वो जीवनभर के लिए यादगार बना सके। अब इस बीच डेस्टिनेशन वेडिंग का क्रेज भी लोगों के बीच बढ़ रहा है। कुछ लोग अपने शहर में ही शादियां कर रहे हैं तो कुछ शहर से बाहर जाकर शादियां कर डेस्टिनेशन वेडिंग कर रहे हैं। इस तरह की शादियों में आम शादी से ज्यादा खर्चा आता है। डेस्टिनेशन वेडिंग के नाम पर लोग इस बार शादी पर करोड़ों रुपए खर्च कर रहे हैं। उत्तराखंड वेडिंग डेस्टिनेशन में निवेश के लिए आगे आए निवेशक, खूबसूरत वादियों में शादियां होंगी यादगार उत्तराखंड में कुदरत ने अपनी ऐसी नेमत बरसाई है कि जहां नजर जाएगी, वहां से हटाने का मन नहीं करता है। यहां की खूबसूरत वादियां लोगों को खूब लुभाती है। यही वजह है कि देश विदेश से सैलानी बरबस ही यहां खींचे चले आते हैं। यहां घूमने के अलावा शादियों का प्लान किया जाए तो कभी न भूलने वाला पल होगा। क्योंकि, उत्तराखंड में कई ऐसे वेडिंग डेस्टिनेशन हैं, जहां सात फेरे लेकर अपनी शादी को यादगार बना सकते हैं।

ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के बाद तो वेडिंग डेस्टिनेशन सुर्खियों में है। इतना ही नहीं अब निवेशक वेडिंग डेस्टिनेशन में निवेश के लिए आगे भी आने लगे हैं। 23 बरस पहले जब इस राज्य के गठन की मांग के लिए आन्दोलन किये जा रहे थे उस समय जब आन्दोलन करने वालों से एक महत्वपूर्ण सवाल पूछा जाता था कि आखिर राज्य की आय का स्त्रोत क्या होगा? राज्य में रोजगार कहां मिलेगा तब सभी राज्य आन्दोलनकारी एक स्वर में कहते थे पर्यटन हमारी आय का एक प्रमुख स्त्रोत होगा। आज राज्य बनने के 23 साल बाद प्रधान मंत्री का यह कहना कि पर्यटन रोजगार देने में कारगर साबित हो सकता है, यह बताने को काफ़ी है कि 23 साल में हमने पर्यटन में कितना कुछ पाया है। वैडिंग डेस्टिनेशन के कांसेप्ट को ही लें। भारत में डेस्टिनेशन के कांसेप्ट की संभावना वाले मुख्य राज्य राजस्थान, गोवा, केरल और उत्तराखंड हैं।

एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में वैडिंग डेस्टिनेशन का व्यापार 20 से 30 प्रतिशत की दर से वृद्धि कर रहा है। वैश्विक स्तर पर भी वैडिंग डेस्टिनेशन का प्रचलन खूब है जो मिलियन डालर का वार्षिक व्यापार करता है। वैडिंग डेस्टिनेशन कांसेप्ट के तहत दूल्हा और दुल्हन अपने घर से दूर किसी अन्य स्थान पर विवाह करते हैं। भारत में अभी तक इस कांसेप्ट के तहत विवाह अपनी परम्परा और रीति-रिवाज से ही होता है मतलब विवाह में केवल स्थान अलग होता है बांकी सब वही रहता है। राजस्थान और गोवा में स्थानीय झलक देखने को जरुर मिलती है। वैडिंग डेस्टिनेशन कांसेप्ट से स्थानीय स्तर पर व्यापार करने वालों को काफ़ी फ़ायदा होता है।

जैसे कि अगर आपने कभी राजस्थान में होने वाले ऐसे किसी विवाह समारोह में भाग लिया होगा तो विवाह के अंत में मेहमानों को दिया जाने वाला तोहफ़ा वहां के किसी स्थानीय उत्पादकों द्वारा बनाया होता है या आप केरल में किसी ऐसे विवाह में शामिल हो जाईये वहां मेहमानों को मिलने वाली मिठाई स्थानीय उत्पादकों द्वारा तैयार की जाती है। मेहमानों के स्वागत के लिए स्थानीय वाद्य यंत्र प्रयोग में लाये जाते हैं। वैडिंग डेस्टिनेशन कांसेप्ट को उत्तराखंड की स्थिति समझने के लिये हालिया गुप्ता विवाह एक अच्छा उदाहरण है। मुख्यमंत्री ने अपने फेसबुक अकाउंट पर अपने स्वागत के दौरान जो फोटो साझा की है उसमें वजने वाला वाद्य यंत्र स्थानीय नहीं है। इस विवाह में जितना भी खाद्यान्न प्रयोग में लाया गया होगा वह हमने आयात किया होगा क्योंकि उत्तराखंड इतना उत्पादन ही नहीं करता कि ऐसे बड़े समारोह की मांग पूरी कर सके। इस विवाह में ऐसा कोई तोहफा भी शायद मेहमानों को दिया गया हो जिससे स्थानीय उत्पादकों को लाभ मिला हो. इस पूरे विवाह में आपको औली की सुन्दरता के अतिरिक्त शायद ही कोई स्थानीय झलक देखने को मिली हो।

वैडिंग डेस्टिनेशन कांसेप्ट स्थानीय लोगों के लिए रोजगार की अपार संभावना रखता है। क्योंकि यह विवाह समारोह का ही एक बड़ा रूप है इसलिये इससे मिलने वाले रोज़गार में कितनी संभावना है उसके लिये मैदानी क्षेत्रों में होने वाले रिसॉर्ट और बैंकेंट हॉल में होने वाले विवाहों द्वारा दिए जाने वाले रोजगार पर भी एक नज़र दौड़ानी चाहिये।मैदानी क्षेत्रों के रिसार्ट में अगर आप एक नज़र दौडायेंगे तो मैनेजर के अलावा दो-एक पोस्ट के अलावा अधिकांश काम बाहरी लोगों के जिम्मे हैं। बहुत अधिक मुनाफ़े का व्यापार होने के बावजूद इसके लाभ का 50 प्रतिशत से अधिक का हिस्सा राज्य के बाहरी लोगों को जाता है। पूरी तरह से परंपरागत तरीकों से होने वाले इन विवाह समारोह से राज्य को बहुत अधिक लाभ नहीं होता क्योंकि हम उत्पादन के मामले में शून्य हैं। शादी में प्रयोग होने वाले दूल्हा-दुल्हन के लिबाज से लेकर शादी में प्रयोग होने वाले खाने के मसालों को हम आयात ही करते हैं।

इस वर्ष 14 जनवरी से 15 दिसंबर तक त्रियुगीनारायण मंदिर में करीब 80 जोड़े विवाह सूत्र में बंधे, जिनमें स्थानीय के साथ ही अन्य क्षेत्रों और जनपदों के लोग भी शामिल हैं। इसके अलावा टिहरी झील, उत्तरकाशी जिले में हिमाचल सीमा में स्थित हाटकोटी माता मंदिर में भी हर साल शादी के लिए कई जोड़े पहुंचते हैं। देहरादून में क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी भी शादी कर चुके हैं।गढ़वाल के अलावा कुमाऊं में भी जागेश्वर धाम, रामनगर, भीमताल, पिथौरागढ़,कौसानी जैसे स्थानों पर भी वेडिंग डेस्टिनेशन की संभावनाएं हैं। चमोली जिले का औली भी प्राकृतिक खूबसूरती का खजाना है, लेकिन इसकी पहचान अब तक बर्फबारी के दीदार और स्कीइंग तक ही सीमित है।हालांकि,अक्तूबर में संस्कृति के क्षेत्र में काम कर रहे पांड्वाज ग्रुप के कुणाल डोभाल ने यहां शादी समारोह का आयोजन कर वेडिंग डेस्टिनेशन के रूप में आशा की किरण दिखाई है।

2018 में प्रदेश सरकार ने त्रियुगीनारायण को वेडिंग डेस्टिनेशन के रूप में विकसित करने की घोषणा की थी, लेकिन पांच साल बाद भी यहां सुविधाएं न के बराबर हैं। मंदिर के पुजारियों और तीर्थपुरोहितों तक के लिए शौचालय और स्नानघर तक की सुविधा नहीं है। इसके अलावा ऊखीमठ में अनिरुद्ध और ऊषा का विवाह स्थल भी है, लेकिन प्रचार-प्रसार के अभाव में यह देश- दुनिया से अछूता है। हिमालयी राज्य उत्तराखंड हर साल तीन लाख करोड़ रुपये से अधिक की पर्यावरणीय सेवाएं दे रहा है। इसमें अकेले वनों की भागीदारी लगभग एक लाख करोड़ रुपये की है।इससे वनों के महत्व को समझा जा सकता है, लेकिन इन पर खतरे कम नहीं है। इसके अलावा आपदा की दृष्टि से भी यह राज्य कम संवेदनशील नहीं है। प्रतिवर्ष अतिवृष्टि, भूस्खलन जैसी आपदाओं में बड़े पैमाने पर जानमाल की क्षति हो रही है। यद्यपि, आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण को कदम उठाए गए हैं, लेकिन इस दिशा में अभी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है।

इस परिदृश्य के बीच वन बचाने के साथ ही आपदा से निबटने की चुनौती तंत्र के सामने है। न केवल उत्तराखंड बल्कि अन्य हिमालयी राज्यों के सामने में ये चुनौतियां मुंहबाए खड़ी हैं।वनों के परिप्रेक्ष्य में बात करें तो जंगलों का संरक्षण उत्तराखंड की परंपरा में शामिल रहा है। एक दौर में उत्तराखंड के लोग वनों से अपनी आवश्यकताएं पूरी करने के साथ ही इन्हें पनपाते भी थे। वर्ष 1980 में वन कानूनों के अस्तित्व में आने के बाद से यहां वन और जन के इस रिश्ते में दूरी बढ़ी है। इस खाई को पाटने की चुनौती तंत्र के सामने है।इसके अलावा वन क्षेत्रों में होने वाले पौधारोपण में पौधों के जीवित रहने की सफलता का प्रतिशत, वनों को आग से बचाना, अवैध कटाना रोकना, जंगल और विकास में बेहतर सामंजस्य, स्थानीय प्रजातियों को महत्व देने के साथ ही वनों के संरक्षण में आमजन की भागीदारी बढ़ाने की चुनौतियां हैं। यद्यपि, ये ऐसी नहीं है कि इनसे पार न पाया जा सके। आवश्यकता हर स्तर पर दृढ़ इच्छाक्ति के साथ आगे बढ़ने की है।

यही नहीं, आपदा और उत्तराखंड का तो मानो चोली-दामन का साथ है। हर साल ही एक के बाद एक प्राकृतिक आपदाओं से यह राज्य जूझ रहा है। इसे हिमालयी क्षेत्र की बिगड़ती सेहत से जोड़कर देखा जा सकता है।हर साल भूस्खलन, अतिवृष्टि जैसे कारणों से दरकते पहाड़ों ने वहां के निवासियों के सामने ठौर का संकट खड़ा कर दिया है। राज्य में आपदा प्रभावित गांवों की संख्या 400 से अधिक पहुंचना इसकी तस्दीक करता है।यद्यपि,आपदा न्यूनीकरण एवं प्रबंधन के साथ ही आपदा प्रभावितों के पुनर्वास को कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन इस दिशा में अधिक गंभीरता से कदम उठाने की आवश्यकता है। बुग्याल ” पेड़ों की रेखाओं से परे, पहाड़ों में ऊंचे स्थान पर जमीन पर एक नरम घास का आवरण है, और अपने आप में एक पारिस्थितिकी तंत्र है।

उत्तराखंड में बुग्याल का मतलब अल्पाइन घास का मैदान होता है। इसका उपयोग अक्सर स्थानीय समुदायों द्वारा अपने मवेशियों के लिए चारागाह के रूप में किया जाता है।औली को अक्सर बुग्याल कहा जाता है। इसमें बर्फ से ढकी हल्की ढलानें हैं जो सर्दियों के दौरान स्कीइंग के लिए उपयुक्त हैं। यह एक कठिन इलाका है और निकटतम शहर जोशीमठ से 14 किलोमीटर लंबी मोटर योग्य सड़क है, जो गर्मियों के दौरान खुली रहती है। वर्ष के अधिकांश हिस्सों में,औली आसानी से पहुंचने योग्य स्थान नहीं है।औली नंदा देवी वन प्रभाग के धौली गंगा जलग्रहण क्षेत्र में पड़ता है। धौली गंगा, गंगा नदी की छह प्रमुख सहायक नदियों में से एक है। धौली गंगा का संपूर्ण जलग्रहण क्षेत्र औषधीय और सुगंधित पौधों
और जड़ी-बूटियों का एक समृद्ध स्रोत है।

औली प्रसिद्ध नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान, एक संरक्षित क्षेत्र, या नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व, एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल की परिधि में भी स्थित है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में धार्मिक यात्रा अथवा वेडिंग के नाम पर एक साथ होने वाली अंधाधुंध मानवीय गतिविधियों को खतरनाक मानते हैं। उनका कहना है कि हिमालयी ढाल अत्यधिक भंगुर प्रकृति के हैं। इन ढालों की जैव विविधता भी इंडमिक टाइप हैं। यानी यहां कई ऐसी वनस्पतियां उगती हैं, जो अन्यत्र कहीं नहीं उगती। वे कहते हैं कि नंदादेवी बायोस्फेयर में स्थानीय लोगों को किसी पेड़ की एक टहनी तक काटने की इजाजत नहीं है, फूलों की घाटी में जहां गडरिये पूरी गर्मी और बरसात में अपने पशुओं को चराते थे, वहां पशुओं को ले जाने पर पाबंदी लगा दी गई है, दूसरी तरफ तीर्थयात्रा के नाम पर एक साथ लाखों की संख्या में लोगों को जाने की इजाजत देना और औली जैसे ढाल पर बड़े समारोह करवाना उचित नहीं है।

वे कहते हैं इस तरह के अंधाधुंध गतिविधियों से इन हिमालयी ढालों को मिलने वाले घाव चिरस्थाई होंगे और जिन वनस्पतियों को नुकसान होगा, उन्हें फिर से उगने में बीसियों वर्ष लगेंगे, क्योंकि इस क्षेत्र की वनस्पतियां स्लो ग्रोविंग हैं। वे पर्यटन, पर्यावरण और विकास में सामंजस्य स्थापित करने को आवश्यक बतातेहैं।वरिष्ठ पत्रकार और पर्यावरण कार्यकर्ता कहते हैं कि हिमालयी क्षेत्रों में जाना बुरा नहीं है, लेकिन इन क्षेत्रों में जाने के कुछ अनकहे नियम होते हैं। हमारे पूर्वज इन क्षेत्रों में जोर-जोर से बातचीत करने और सीटी बजाने तक के लिए मना करते थे। कहा जाता था कि इससे यहां रहने वाले देवता नाराज होते हैं। यह उन लोगों की पर्यावरण के प्रति चेतना थी।

चिपको आंदोलन के नेता चंडीप्रसाद भट्ट का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में एक साथ बहुत ज्यादा लोगों का जाना और बड़े समारोह करना किसी भी दशा में ठीक नहीं है। हिमालयी ग्लेशियरों पर कई डॉक्यूमेंट्री बना चुके टीवी पत्रकार का मानना है कि वेडिंग डेस्टिशन के लिए सरकार को हर तरह की सुविधाएं खुद उपलब्ध करवानी चाहिए, ताकि लोग आएं, शादी करें और चले जाएं। वेडिंग डेस्टिनेशन के नाम पर एक प्राकृतिक ढाल पर मनमानी करने की छूट देना, वहां अस्थाई रूप से तम्बू का शहर बनाना, पारिस्थितिकी के लिए ठीक नहीं। इससे पर्यटन का कोई विकास नहीं होने वाला। पर्यटन के नाम पर यह सिर्फ एक स्ट्रॉयड का इंजेक्शन है, जिसका असर खत्म होने के साथ स्थितियां और गंभीर
रूप से सामने आएंगी।

जोशीमठ के क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष कहते हैं कि सवाल यह उठता है कि इतने बड़े आयोजन के लिए आनन-फानन के इजाजत कैसे मिल गई। स्थानीय युवकों को छोटे-छोटी ट्रेकिंग करने तक के लिए इजाजत नहीं मिलती। स्थानीय लोगों की आजीवका बनती रही यारसा गम्बू (कीड़ाजड़ी) के दोहन पर इसलिए रोक लगा दी गई कि इससे पर्यावरण को नुकसान हो रहा है। बेशक शादियां करवाओ या अंधाधुंध पर्यटक- तीर्थयात्री बुलवाओ, लेकिन पर्यावरण के नाम पर स्थानीय लोगों के रोजगार को मत छीनो।राज्य सरकार की डेस्टिनेशन वेडिंग योजना भी अभी मौखिक तौर पर ही है। नैनीताल हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने वाले अधिवक्ता ने बताया कि जब अदालत ने सरकार से डेस्टिनेशन वेडिंग पॉलिसी दिखाने को कहा तो उनके पास कोई जवाब नहीं था। ये ट्रेंड इतना बढ़ने लगा कि प्रधानमंत्री ने भी रेडियो पर अपने मन की बात कार्यक्रम इस पर अपनी चिंता जाहिर कर दी। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, इन दिनों ये जो कुछ परिवारों में विदेशों में जाकर के शादी करने का एक नया वातावरण बनता जा रहा है। क्या, ये जरूरी है

(लेखक दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं)

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