पर्यावरण संतुलन के लिये वन्यजीवों की रक्षा जरूरी

पर्यावरण संतुलन के लिये वन्यजीवों की रक्षा जरूरी

  डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

जंगल प्रकृति का एक खूबसूरत चेहरा है जहां हरे भरे पेड़, जीव जंतु, जड़ी बूटियां, अलग-अलग प्रजातियों के खूबसूरत पक्षियों का आशियाना, शेर, मगरमच्छ, हाथी जैसी सैकड़ों वन्यजीव मौजूद हैं। खाल, नाखून, सींग और मांस के लिए इन जीवों का शिकार किया जाता है। जिनका उपयोग फैशन,सौन्दर्य उत्पादन और कई विशिष्ट प्रकार की दवाओं के लिए किया जाता है। मनुष्य इन जानवरों का शिकार केवल अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए करते हैं, जो अनावश्यक हैं। हालांकि, इनकी आपूर्ति अन्य विकल्पों से भी पूरी की जा सकती हैं। इसलिए वन्यजीव प्रजातियों का शिकार रोकना वन्यजीव संरक्षण के तहत आता। यह पृथ्वी पर वन्य जीवों और उनके आवास की रक्षा की जरूरत है, ताकि उनकी आने वाली पीढ़ियां बिना किसी डर के रह सकें।

दुनियाभर से लुप्त हो रहे जंगली जीव-जंतुओं की प्रजातियों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए हर साल 3 मार्च को विश्व वन्यजीव दिवस मनाया जाता हैभारत में इस समय ज्यादा से ज्यादा जीवों की प्रजातियां खतरे में हैंसमय रहते इस ओर ध्यान न दिया गया तो स्थिति और भी खतरनाक हो सकती है। हालांकि, 1960 के दशक से ही वैज्ञानिक जानवरों का पता लगाने और उनकी गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए रेडियो टेलीमेट्री का उपयोग कर रहे हैं। रेडियो टेलीमेट्री स्थान निर्धारित करने के लिए रेडियो संकेतों का उपयोग करती है,जो अदृश्य और मूक विद्युत चुम्बकीय तरंगों से बने होते हैं। भारत में पहली बार पूरी तरह रेडियो-टेलीमेट्री अध्ययन 1983 में हैदराबाद में भारतीय वन्यजीव संस्थान के मगरमच्छ अनुसंधान केंद्र द्वारा किया गया था। उन्होंने चंबल नदी में 12 घड़ियालों पर नजर रखने के लिए एक ट्रांसमीटर उपकरण लगाया। इसके बाद भारत में ऐसे कई अध्ययनों का रास्ता खुल गया।

एशियाई हाथी पहला जानवर था जिसे 1985 में भारत में मुदुमलाई वन्यजीव अभयारण्य में रिसर्च के लिए रेडियो कॉलर लगाया गया था। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी की ओर से ऑपरेशन मासिनागुडी नामक एक परियोजना में दो हाथियों को रेडियो कॉलर लगाए गए और फिर इन्हें ट्रैक किया गया। इसके बाद 90 के दशक की शुरुआत में संरक्षणवादी और बाघ विशेषज्ञ उल्लास कारंत ने भारत में सबसे बेशकीमती माने जाने वाले बाघों पर रेडियो कॉलर का इस्तेमाल करते हुए पहला अध्ययन किया गया।उनके व्यवहार और पारिस्थितिकी को समझने के लिए चार बाघों को रेडियो- कॉलर लगाया गया। इसमें यह जानकारी का पता करना भी शामिल था कि वे बाघ पश्चिमी घाट के मलनाड क्षेत्र में नागरहोल राष्ट्रीय उद्यान में किस तरह रह रहे हैं। इसके बाद के दशकों में रेडियो-कॉलर से जुड़े कई अध्ययन किए गए।

सरकार के प्रयासों से भी पिछले कुछ वर्षों में बाघों की संख्‍या में काफी बढ़ोतरी हुई है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मन की बात कार्यक्रम में बताया कि किस तरह से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से मनुष्य और बाघों के बीच संघर्ष कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं। ए.आई. के माध्यम से स्थानीय लोगों को उनके मोबाइल पर बाघों के आने के बारे में सतर्क कर दिया जाता है। गांव और वन की सीमा पर कैमरे लगाए गए हैं। नए उद्यमी भी वन्य जीव संरक्षण और इको पर्यटन में नवाचारों पर काम कर रहे हैं।प्रधानमंत्री ने अपने कार्यक्रम मन की बात में छत्तीसगढ़ में हाथियों के लिए शुरू किए गए रेडियो कार्यक्रम हमर हाथी हमर गोठ का भी जिक्र किया था। साल 2017 में छत्तीसगढ़ में हाथियों के आतंक को रोकने और ग्रामीणों को सचेत करने के लिए आकाशवाणी के रायपुर केंद्र से हमर हाथी-हमर गोठ कार्यक्रम का प्रसारण किया गया।

सोशल मीडिया के इस दौर में रेडियो कितना सशक्त माध्यम हो सकता है, इसका अनूठा प्रयोग छत्तीसगढ़ में हाथियों की सूचनाओं के लिए किया जा रहा है।काम से वापस लौटते समय शाम को हाथियों की उपस्थिति का सही लोकेशन मिलने से लोग रास्ता बदलकर सुरक्षित रास्ते से वापस घर आ रहे हैं। छत्तीसगढ़ राज्य की इस पहल से देश के अन्य हाथी प्रभावित क्षेत्रों में भी अपनाई जा सकती है। वन्यजीवों को बचाने के लिए रेडियों एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। जहां टीवी की पहुंच नही है उस जगह रेडियो के माध्यम से जागरूकता अभियान को बढ़ावा देना होगा। सरकार द्वारा चलाए जा रहे वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम की जानकारी लोगों तक पहुंचानी होगी। प्रकृति की सुंदरता निखारने में वन्यजीव महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं इसलिए सरकार द्वारा संरक्षण प्रयासों के साथ, यह हमारी सामाजिक जिम्मेदारी भी है, कि हम व्यक्तिगत रूप से वन्यजीवों के संरक्षण में अपना योगदान करें।

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा वन्यजीव और प्रकृति में माध्यम से आता है।बहुत से लोग अपनी जीविका के लिए कहीं न कहीं वन और वन्यजीवों पर आश्रित हैं। इसीलिए इनका संरक्षण और भी ज्यादा जरूरी हो जाता है। वन्यजीवों का न केवल आर्थिक और सामाजिक महत्व बल्कि सांस्कृतिक महत्व भी है। ये शुरू से ही हमारी सभ्यता और संस्कृति के अभिन्न अंग रहे हैं। इतना ही नहीं एक बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी प्रकृति और वन्यजीवों के करीब रहने की सलाह दी जाती है। हर जगह लोग भोजन से लेकर ईंधन, दवाएं, आवास और कपड़े तक अपनी सारी जरूरतों को पूरा करने के लिए वन्यजीवन और जैव विविधता आधारित संसाधनों पर निर्भर हैं।

प्रकृति हमें और हमारे ग्रह को जो लाभ और सुंदरता प्रदान करती है उसका आनंद लेने के लिए यह जरूरी है की लोग यह सुनिश्चित करें कि पारिस्थितिकी तंत्र फलने-फूलने में सक्षम हो और पौधों तथा जानवरों की प्रजातियां भविष्य की पीढ़ियों के लिए अस्तित्व में रहने में सक्षम हों। विकसित और विकासशील देशों में अरबों लोग हर दिन भोजन, ऊर्जा, सामग्री, दवा, मनोरंजन, प्रेरणा और मानव कल्याण के लिए कई अन्य महत्वपूर्ण चीजों  के लिए जंगली प्रजातियों के उपयोग से लाभान्वित होते हैं। तेजी से बढ़ता वैश्विक जैव विविधता संकट, पौधों और जानवरों की एक लाख प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं।बोर्नियो के वनमानुष, सुमात्रा के हाथी और काले गैंडे में क्या समानता है? पूरी तरह से शांत जानवर होने के अलावा, जिन्हें हम अब बहुत कम देखते हैं। इन प्राणियों के बारे में सच्चाई यह है कि वे सभी गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजातियां हैं। लेकिन विश्व वन्यजीव दिवस पर, संयुक्त राष्ट्र और उसके सहयोगी इस गंभीर स्थिति की गंभीरता के बारे में जागरूकता बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। एक जानवर को केवल तभी गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजातियों की सूची में रखा जाता है, जब  प्रकृति के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ  को लगता है कि जानवर विलुप्त होने के लिए एक बहुत भारी खतरे का सामना करता है।गंभीर रूप से लुप्तप्राय क्या है?

वर्तमान अनुमानों के अनुसार पूरी दुनिया में जीवित काले गैंडों की संख्या लगभग 2,500 है। देश के सुदूर पूर्वी इलाकों में पाया जाने वाला रूस का अमूर तेंदुआ विलुप्त होने के कगार पर है, जो दुनिया में केवल 40 ही बचे हैं। दुर्भाग्य से, यह सूची लगातार और आगे बढ़ रही है।निश्चित ही इस दिशा में वैसे तो बहुत से काम किए जा रहे हैं परन्तु पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बनाए रखने के लिए अभी और प्रयासों की आवश्यकता है। जरूरत यह भी है कि हम वन्यजीवों के महत्व को समझें। उनका होना एक वरदान समझ कर उनके होने का जश्न मनाएं। उनके संरक्षण की बात को केवल कागजी बात न मान कर उसे अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाते हुए इस दिशा में निरंतर प्रयास करते रहें। हमारी सभ्यता और संस्कृति के अभिन्न अंग रहे हैं। इतना ही नहीं एक बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी प्रकृति और वन्यजीवों के करीब रहने की सलाह दी जाती है। हर जगह लोग भोजन से लेकर ईंधन, दवाएं, आवास और कपड़े तक अपनी सारी जरूरतों को पूरा करने के लिए वन्यजीवन और जैव विविधता आधारित संसाधनों पर निर्भर हैं।

भारत की बात करें तो यहां अवैध शिकार से सालाना 40 प्रतिशत हाथियों की मौत होती है। इसी तरह 2006 से 2015 के बीच काजीरंगा पार्क में 123 गैंडों को शिकार बनाया गया। साल 2013 -16 के बीच देश में संरक्षित 1200 से अधिक जानवरों का शिकार किया गया। गौर करें तो वन्य जीवन पर खतरे के महत्वूर्ण कारणों में 71.8 प्रतिशत शिकार, 34.7 प्रतिशत बढ़ता शहरीकरण, 19.4  प्रतिशत ग्लोबल वार्मिंग, 21.9 प्रतिशत प्रदूषण और 62.2 प्रतिशत खेत बनते जंगल मुख्य रुप से जिम्मेदार है। इसी तरह जलीय जीवों के अवैध शिकार के कारण भी 300 प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। जलीय जीवों के नष्ट होने का एक अन्य कारण फफूंद संक्रमण और औद्योगिक इकाईयों का प्रदूषण भी है। इसके अलावा प्राकृतिक आपदाएं, विभिन्न प्रकार के रोग, जीवों की प्रजनन क्षमता में कमी भी प्रमुख कारण हैं। इन्हीं कारणों की वजह से यूरोप के समुद्र में ह्वेल और डाॅल्फिन जैसे भारी-भरकम जीव तेजी से खत्म हो रहे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक भीड़ बकरियों जैसे जानवरों के उपचार में दिए जा रहे खतरनाक दवाओं के कारण भी पिछले 20 सालों में दक्षिण-पूर्व एशिया में गिद्धों की संख्या में कमी आयी है।

भारत में ही पिछले एक दशक में पर्यावरण को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गिद्धों की संख्या में97 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गयी है। गिद्धों की कमी से मृत पशुओं की सफाई, बीजों का प्रकीर्णन और परागण कार्य बुरी तरह प्रभावित हुआ हो रहा है और किस्म- किस्म की बीमारियां तेजी से पनप रही हैं। गिद्धों की तरह अन्य प्रजातियां भी तेजी से विलुप्तहो रही हैं। वन्य जीवों के वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो पृथ्वी के समस्त जीवधारियों में से ज्ञात एवं वर्णित जातियों की संख्या लगभग 18 लाख है। लेकिन यह संख्या वास्तविक संख्या के तकरीबन 15 प्रतिशत से कम है। जहां तक भारत का सवाल है तो यहां विभिन्न प्रकार के जीव बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। जीवों की लगभग 75 हजार प्रजातियां पायी जाती है। इनमें तकरीबन 350 स्तरनधारी, 1250 पक्षी, 150 उभयचर, 2100 मछलियां, 60 हजार कीट व चार हजार से अधिक मोलस्क व रीढ़ वाले जीव हैं। भारत में जीवों के संरक्षण के लिए कानून बने हैं। लेकिन इसके बावजूद भी जीवों का संहार जारी है। जैव विविधता को बचाने के लिए आवश्यक है कि जीवों को बचाया जाए।

अस्तिव के संकट में फंसे जीवों को बचाने के लिए जरुरी है कि धरती के बढ़ते तापमान एवं प्रदूषण की रोकथाम की दिशा में ठोस पहल हो।इसके अलावा वन क्षेत्र को कम करके कृषि विस्तार की योजनाओं पर भी रोक लगनी चाहिए। स्थानान्तरण खेती को नियंत्रित किया जाए तथा यदि संभव हो तो उसे समाप्त ही कर दिया जाए। नगरों के विकास के लिए वनों की कटाई पर भी रोक लगनी चाहिए। लेकिन त्रासदी है कि संपूर्ण विश्व में बड़े पैमाने पर वनों की कटाई जारी है। विडंबना यह कि एक ओर प्राकृतिक आपदाओं से जीव-जंतुओं की प्रजातियां नष्ट हो रही है वहीं रही-सही कसर इंसानी लालच और उसका शिकार का शौक पूरा कर दे रहा है। उचित होगा कि वैश्विक समुदाय वन्य जीवों को बचाने के लिए ठोस रणनीति बनाए अन्यथा वन्य जीवों की विलुप्ति मानव जीवन को भी संकट में डाल सकती है। पृथ्वी पर जीवन का विकास पर्यावरण के अनुकूल ऐसे माहौल में हुआ है, जिसमें जल, जंगल, जमीन और जीव-जंतु सभी आपस में एक- दूसरे से परस्पर जुड़े हुए हैं।

प्रकृति ने धरती से लेकर वायुमंडल तक विस्तृत जैवविविधता को इतनी खूबसूरती से विकसित एवं संचालित किया है कि अगर उसमें से एक भी प्रजाति का वजूद खतरे में पड़ जाए तो सम्पूर्ण जीव-जगत का संतुलन बिगड़ जाता है। प्राकृतिक संतुलन के लिए सभी वन्य प्राणियों का सरंक्षण बेहद जरूरी है, अन्यथा किसी भी एक वन्य प्राणी के विलुप्त होने पर पूरी संरचना धीरे-धीरे बिखरने लगती है। चूंकि पारिस्थितिकी तंत्र में विभिन्न जीव एक दूसरे पर निर्भर हैं, इसलिए अन्य प्राणियों की विलुप्ति से हम इंसानों पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। नए वैज्ञानिक अध्ययन चेताते हैं कि इंसान जानवर को महज जानवर न समझे, बल्कि अपना वजूद बनाए रखने का सहारा समझे। दो या तीन दशकों के भीतर इंसान अगर वन्य जीवों की संख्या में हो रहे गिरावट को नहीं रोक पाया, तो मानव अस्तित्व के लिए एक बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा।

( लेखक दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं )

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