दीदी के ‘दैय्या रे दैय्या’ गीत से पहाड़ी संस्कृति को मिली वैश्विक पहचान

दीदी के ‘दैय्या रे दैय्या’ गीत से पहाड़ी संस्कृति को मिली वैश्विक पहचान

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

भारत की नाइटिंगेल’ के नाम से दुनियाभर में मशहूर लता मंगेशकर ने करीब पांच दशक तक हिंदी सिनेमा में फीमेल प्‍लेबैक सिंगिंग में एकछत्र राज किया। मंगेशकर ने 1942 में महज 13 साल की उम्र में अपने करियर की शुरुआत की थी। उन्होंने कई भारतीय भाषाओं में अब तक 30 हजार से ज्यादा गाने गाए हैं। उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से भी नवाजा जा चुका है। इसके अलावा उन्हें पद्म भूषण, पद्म विभूषण और दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।मधुमति फिल्म के लिए लता ने पांच गीत गाए और इन गीतों की शूटिंग नैनीताल के निकट भवाली, घोड़ाखाल, गेठिया आदि क्षेत्रों में हुई थी। ये सभी गीत बेहद लोकप्रिय हुए थे और आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं।

स्व. लता मंगेशकर को तमाम लोग सरस्वती की पुत्री कहते थे, यह संयोग है कि अपने अंतिम समय में वे वसंत पंचमी को मां सरस्वती का आशीर्वाद लेने के बाद ही अंतिम सफर पर रवाना भी हुईं। निर्माता, निर्देशक बिमल रॉय की मधुमति फिल्म के लिए गाए गीत से कुमाऊं की नृत्य शैली, वेशभूषा और संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाने वाली लता जी का जाना कुमाऊं वासियों के लिए भी एक सदमे के समान है। मधुमति फिल्म के लिए लता ने पांच गीत गाए और इन गीतों की शूटिंग नैनीताल के निकट भवाली, घोड़ाखाल, गेठिया आदि क्षेत्रों में हुई थी। ये सभी गीत बेहद लोकप्रिय हुए थे और आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं। इनमें से एक गीत आजा रे परदेसी के लिए लता को 1958 का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला था।

आजादी के बाद कुमाऊं में फिल्मायी गई यह पहली फिल्म थी। दिलीप कुमार, वैजयंतीमाला अभिनीत इस फिल्म से जहां कुमाऊं बॉलीवुड की नजरों में आया वहीं दिलीप, वैजयंती पर फिल्माए गीत ‘दैय्या रे दैय्या चढ़ गयो पापी बिछुआ’ से पहाड़ी घसियारी नृत्य, वेशभूषा और संस्कृति को भी दुनिया ने जाना। शैलेंद्र के लिखे, सलिल चौधरी के द्वारा संगीतबद्ध इस गीत और इसके नृत्य से उत्तराखंड के घसियारी नृत्य ने अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई। घसियारी नृत्य कुमाऊंनी झोड़ा और चांचरी की भाव भंगिमाओं का मिलाजुला रूप है। नृत्य सम्राट उदयशंकर ने ‘दैय्या रे दैय्या’ में पहाड़ी घसियारी नृत्य के कुछ अंश शामिल कराए थे। प्रसिद्ध इतिहासकार की पुस्तक कल्चरल हिस्ट्री ऑफ उतराखंड में इस बात का उल्लेख किया गया है।

दैय्या रे दैय्या नृत्य की कॉस्ट्यूम डिजाइन वैजयंती माला की मां ने की थी। नृत्य में कुमाऊंनी स्टाइल के चांदी के गहने प्रयुक्त किए गए थे, जो खुद वैजयंती माला के थे। बाद में प्रसिद्ध कोरियोग्राफर बनीं सरोज खान तब इस गाने में बैकग्राउंड डांसर रही थीं। इस फिल्म पर आधारित कई अन्य फिल्में कुदरत, बीस साल बाद, और ओम शांति ओम भीबनीं।लता मंगेशकर ने 1990 में प्रदर्शित गढ़वाली फिल्म रैबार के ‘मन भरमेगे मेरु सुध बुध ख्वे गे..’ गीत को अपनी आवाज दी थी। देवी प्रसाद सेमवाल के लिखे गीत की धुन कुंवर सिंह बावला ने बनाई थी, फिल्म का निर्देशन अनुज जोशी ने किया था। लता ने गीत के एक-एक शब्द का अर्थ व उच्चारण गहराई से समझा और फिर इसे हूबहू गढ़वाली अंदाज में गाकर अमर कर दिया था। हिंदी के अलावा लगभग हर प्रमुख आंचलिक भाषाओं में लता दीदी के गानों ने अलग छाप छोड़ी है। हम अहसानमंद हैं कि लता दीदी की आवाज में गढ़वाली फ़िल्म च्रैबारज् का ज्मन भरमेगे.. गीत हमारे पास उनकी बेशकीमती धरोहर के रूप में हमेशा रहेगा।

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