मक्के को अनाजों की रानी ने नाम से जाना जाता है

मक्के को अनाजों की रानी ने नाम से जाना जाता है

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

दुनिया की भूख मिटाने में अहम योगदान देने वाले अनाजों में प्रमुख मक्का का इतिहास जितना हम पहले जानते थे, उसकी तुलना में कहीं ज्यादा जटिल है। क्या आपने कभी सोचा है मक्का को जंगल से निकाल कर खेतों में उगाने की प्रक्रिया करीब 9000 साल पहले मेक्सिको में शुरू हुई। रिसर्चरों का कहना है कि आंशिक रूप से खेती में शामिल हो चुके मक्का की एक किस्म दक्षिण अमेरिका में 6500 साल पहले भी आई और इन किस्मों का विकास दोनों जगह पर अपने अपने तरीके से चलता रहा। वैज्ञानिकों ने मक्का को खेती में शामिल किए जाने की प्रक्रिया का जीन और पुरातत्व के लिहाज से विस्तृत विश्लेषण कर कुछ नए नतीजे निकाले हैं।अब तक तो यही माना जाता रहा है कि मक्का को खेती में शामिल करने की प्रक्रिया दक्षिण मध्य मेक्सिको की बालसास नदी घाटी में हुई। यह जगह मेक्सिको सिटी के दक्षिण में है बाद में मक्का यहीं से अमेरिका के दूसरे हिस्सों में गया। पहले इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी लेकिन मक्का को खेती में शामिल करने की एक दूसरी अहम प्रक्रिया भी चली थी।

यह प्रक्रिया दक्षिण पश्चिम अमेजन के इलाके में चली, जिसका विस्तार ब्राजील और बोलिविया तक था और जिस दौरान यह हुआ, उस वक्त मेक्सिको वाली प्रक्रिया भी अभी चल ही रही थी। मक्का या मकई वैश्विक फसल तब बनी जब करीब 500 साल पहले यूरोपीय लोग अमेरिका पहुंचे। अमेरिका में पैदा हुई दूसरी फसलों में आलू, शकरकंद, चॉकलेट, टमाटर, मटर और एवोकाडो भी है। आज दुनिया में सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली फसल मक्का है। केवल अमेरिका में ही हर साल 35.4 करोड़ मीट्रिक टन मक्का उगाया जाता है। रिसर्चरों ने मक्का की 40 आधुनिक किस्मों के जीनोम सिक्वेंस और करीब एक हजार साल पुराने 9 पुरातात्विक मक्के के नमूनों का विश्लेषण करने के साथ ही 68 आधुनिक और दो प्राचीन मक्का के जीनोम का भी विश्लेषण किया, जिनके जीनोम के बारे में पहले जानकारी दी जा चुकी है।

नेशनल म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री में पुरातात्विक जीनोम अध्ययन और पुरातात्विक वनस्पति विज्ञान के क्यूरेटर लोगान किस्टलर का कहना है, “खेती में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद तुरंत ही लोग इन फसलों को दूर दराज के इलाकों में ले कर जाने लगे, उस वक्त तक तो अभी उस प्रक्रिया में यह तय भी नहीं हुआ था कि इंसानों को पसंद आने वाली किस्में कौन सी होंगी” ,किस्टलर इस रिसर्च की रिपोर्ट के प्रमुख लेखक है। दक्षिण पश्चिमी अमेजन पहले से ही फसलों को खेती में शामिल करने की प्रक्रिया का एक प्रमुख ठिकाना बना हुआ था। इसी बीच आंशिक रूप से खेती में शामिल हो चुके मक्का को यहां लाया गया। वहां स्क्वैश, यूका (एक दक्षिण अमेरिकी सब्जी) और एक स्थानीय चावल की खेती हो रही थी। मक्का का जंगली पूर्वज एक घास है जिसे टेयोसिंटे कहते है। किस्टलर का कहना है,मक्का इंसानों के लिए सबसे अहम पौधा है हर साल हम एक अरब टन से ज्यादा मक्का उगाते हैं, गेहूं और चावल के साथ मक्का दुनिया भर में कैलोरी के सबसे बड़े स्रोतों में शामिल है।

किस्टलर के मुताबिक मक्का इंसानों के लिए कितना अहम है यह इस बात से समझा जा सकता है कि कि उसे खेती में शामिल करने की प्रक्रिया उत्पत्ति की बुनियादी घटनाओं में है और यह इंसानों की जिंदगी और इतिहास को एक आकृति देने के साथ पूरी हुई.यह कहां से आया और कैसे दुनिया भर में फैल गया मक्का (ज़िया मेस एल.) विभिन्न कृषि-जलवायु स्थितियों के अंतर्गत सबसे बहुमुखी उभरती हुई व्यापक अनुकूल फसल में से एक है। वैश्विक स्तर पर, मक्का को अनाजों में प्रमुख माना जाना जाता है क्योंकि इसमें अनाजों के बीच उच्च आनुवांशिक उपज क्षमता होती है। इसकी खेती लगभग 165 देशों में लगभग 190 मीटर हेक्टेयर पर की जाती है जिसमें मिट्टी, जलवायु, जैव विविधता और प्रबंधन प्रथाओं की व्यापक विविधता है जिसका वैश्विक अनाज उत्पादन में 39% योगदान है। लगभग 36% योगदान के साथ संयुक्त राज्य अमरीका (यू.एस.एस) मक्का का सबसे बड़ा उत्पादक है।मक्का अमरीकी अर्थव्यवस्था का चालक है। भारत में मक्का पूरे वर्ष उत्पादित किया जाता है।

मक्का, सीजन में खेती के अंतर्गत 85% क्षेत्र के साथ एक प्रमुख खरीफ फसल है। भारत में चावल और गेहूं के बाद मक्का तीसरी सबसे महत्वपूर्ण अनाज की फसल है। यह देश में कुल अनाज उत्पादन का लगभग 10 प्रतिशत है। पशुओं के लिए मानव और गुणवत्ता खाद्य के लिए मुख्य भोजन के अतिरिक्त मक्का हजारों औद्योगिक उत्पादों के लिए एक मूल कच्चे माल के रूप में कार्य करता है जिसमें स्टार्च, तेल, प्रोटीन, मादक पेय पदार्थ, खाद्य स्वीटर्स, फार्मास्यूटिकल, कॉस्मेटिक, फिल्म, कपड़ा, गम, पैकेज और पेपर उद्योग आदि शामिल हैं। भारत से वर्ष 2022-23 के दौरान विश्व भर में 3,453,680.58 मीट्रिक टन मक्के का निर्यात किया गया जिसकी कीमत 8,987.13 करोड़ रुपए/ 1,116.17 अमरीकी मिलियन अमरीकी डॉलर थी।

आयुर्वेद के अनुसार मक्का तृप्तिदायक, वातकारक, कफ, पित्तनाशक अनाज है। मक्के में फोलिक एसिड, प्रोटीन, कार्बोहाईड्रेट प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यही नहीं मक्के के पीले दानों में मैग्नीशियम, आयरन, कॉपर, फास्फोरस भी मिलता है। जिससे हड्डियां मजबूत होती हैं और बुढ़ापे में हड्डियों के टूटने की संभावना भी कम होती है।यह गुर्दों की कमजोरी, पेट का कैंसर कम करने में भी लाभदायक है।गर्भवती महिलाओं के लिए मक्का बेहद कारगर है। मक्के में ढेर सारे ऐसे पोषक तत्व होते हैं, जो शरीर के लिए फायदेमंद हैं।इसमें कैरोटिनॉयड्स, मैग्नीशियम, आयरन, फेरुलिक एसिड, बीटा-कैरोटीन, कार्बोहाइड्रेट्स, बायोफ्लेवोनॉयड्स, कैरोटेनॉयड्स, विटामिन्स और फाइबर सहित कई तरह के पौषक तत्व पाए जाते हैं, जो शरीर के विकास के लिए जरूरी हैं और बीमारियों से भी बचाते हैं। मक्का का उपयोग अन्य चीजों के अलावा उच्च फ्रुक्टोज कॉर्न सिरप और जैव ईंधन बनाने के लिए किया जाता है।

साबुत मकई, मकई का आटा, कॉर्नस्टार्च, कॉर्न ग्लूटेन, कॉर्न सिरप, कॉर्नमील, मकई का तेल, पॉपकॉर्न, कॉर्नफ्लेक्स और मक्का से बने अन्य उत्पाद लोकप्रिय हैं। मक्का विटामिन, मिनरल और पौष्टिक फाइबर का एक उत्कृष्ट स्रोत है, साथ ही स्वाद कलिकाओं को भी भाता है।कॉर्नफ्लेक्स में पके हुए मकई के समान पोषण प्रोफ़ाइल होती है। मक्का की संरचना कई स्वास्थ्य लाभ प्रदान करती है। उच्च फाइबर सामग्री कब्ज और पेट के कैंसर से बचने में मदद करती है। भारत में कुछ सालों के बाद चावल, गेंहू और मक्का खाने को शायद न मिले या कम मिले। ये सच्चाई है। क्योंकि जिस हिसाब से मौसम बदल रहा है। 2050 तक चावल, गेंह और मक्के की पैदावार में भारी कमी आएगी। 27 साल बाद चावल के पैदावार में20, गेंहू में 19.3 और बाजरे में 18% की गिरावट होगी। वजह क्लाइमेट चेंज है। जलवायु संकट की वजह से भविष्य में अनाज की पैदावार पर असर पड़ेगा।सिर्फ मौसम संबंधी आपदाएं नहीं आएंगी. बल्कि उसका सीधा असर कृषि और फलों की खेती पर पड़ेगा। क्योंकि जिस तेजी से एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स यानी मौसम का तेजी से बदलना और उससे जुड़ी आपदाएं आ रही हैं, देश में लोग दाने-दाने को मोहताज हो सकते हैं।

अप्रत्याशित मौसम के इस दौर में मक्के की खेती की प्रासंगिता बढ़ जाती है। प्रदेश में एक ओर जहां साल दर साल चावल और मक्के जैसे अनाजों के उत्पादन क्षेत्र में कमी देखने की मिल रही है इसके साथ ही पर्वतीय इलाकों में पूंजी निर्माण की प्रक्रिया बेहद धीमी है। बात चाहे पोषक तत्वों की हो या उपयोगिता की। बेहतर उपज की बात करें या सहफसली खेती की और औद्योगिक प्रयोग की। हर मौसम रबी, खरीफ एवं जायद और हर तरह की भूमि में होने वाले मक्के का जवाब नहीं। स्थानीय लोगों के साथ बैठकर उन्हीं के लिये योजनाएं बनाई जायेंगी तो शायद हिमालय के जल, जंगल, जमीन के साथ संस्कृति, परम्पराएं, रीति, रिवाज एवं उनको संरक्षित करने वाला हिमालयवावासी सुरक्षित होगा, ऐसे स्वस्थ एवं खुशहाल उत्तराखण्ड के लिये जमीनी स्तर पर कार्य करने की जरूरत है।

(लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं )

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