पहाड़ के फलों का राजा काफल (Kafal)

पहाड़ के फलों का राजा काफल (Kafal)

 

डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

उत्तराखंड जिसे देवों की भूमि कहा जाता है, जिस प्रकार की भूमि उसी प्रकार के गुण। यहाँ के कण- कण में देवी-देवताओं के आशीर्वाद से प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ दिव्य एवं मनोरम दृश्य यहाँ की भूमि को और अधिक पुण्य बनाती है। यहाँ के फल-फूल पुरे भारत में अपने दैवीय गुणों के कारण प्रसिद्ध है। उत्तराखंड में वैसे तो बहुत से औषधीय एवं दैवीय गुणों वाले फल होते है काफल एंटी-ऑक्सीडेंट गुणों के कारण हमारे शरीर के लिए बेहद फायदेमंद होता है। अत्यधिक रस-युक्त और पाचक होने के कारण काफल को खाने से पेट के कई प्रकार के विकार दूर होते हैं। काफल के अनेक औषधीय गुण आयुर्वेद में मिलते हैं। यह फल अपने‌‌ आप में एक जड़ी-बूटी है। चरक संहिता में भी इसके अनेक गुणकारी लाभों के बारे में वर्णन है।

काफल के छाल, फल, बीज, फूल सभी का इस्तेमाल आयुर्वेद में किया जाता है।काफल सांस संबंधी समस्याओं, डायबिटीज, पाइल्स, मोटापा, सूजन, जलन, मुंह में छाले, मूत्रदोष, बुखार, अपच, शुक्राणु के लिए फायदेमंद और दर्द निवारण में उत्तम है। इन दिनों तराई क्षेत्र में गर्मी शुरू होते ही पर्यटकों का रुख पहाड़ की ओर है। ऐसे में सैलानी भी यहां पहाड़ की ठंडी हवा और रसीले काफल का स्वाद लेने से नहीं चूक रहे हैं।  कुमाऊं के सुप्रसिद्ध लोकगीत बेडू पाको बारों मासा, ओ नरैंण काफल पाकोचैता में वर्णित चैत यानी चैत्र माह के आखिर में पकना शुरू करने वाला और वास्तव में मई-जून की गर्मियों में शीतलता प्रदान करने वाला काफल (वानस्पतिक नाम मैरिका एस्कुलेंटा-डलतपबं मेबनसमदजं) इस बार फागुन यानी करीब डेढ़ माह पूर्व ही पक गया है। हालांकि इससे वर्ष 2018 व 2019में काफल लगातार दो वर्ष संभवतया अपने इतिहास में पहली बार, कड़ाके की सर्दियों के पौष यानी जनवरी माह के शुरू में ही पककर भी चौंका चुका है। इसका कारण वैश्विक चिंता का कारण बने ग्लोबलवार्मिंग के साथ ही स्थानीय तौर पर इस वर्ष शीतकालीन वर्षा का न होना माना जा रहा है।

उत्तराखंड, देवताओं की भूमि कफल नामक एक पुनरोद्धार फल को जन्म देती है, जिसमें कई प्रकार के गुण होते हैं, यह आसानी से लोगों का ध्यान आकर्षित करता है। इस फल के पीछे एक बहुत ही मार्मिक कहानी है जो आपकी आंखों में आंसू ला सकती है। कहा जाता है कि काफल मानव शरीर को हमेशा जवान और तंदुरूस्त रखता है।

उत्तराखंड के एक गांव में एक गरीब महिला अपनी छोटी सी बेटी के साथ रहती थी, दोनों ही एक दूसरे का सहारा थे। जमीन का एक छोटा हिस्सा उनके लिए कमाई का एकमात्र स्रोत था, जो शायद ही उन्हें अपने जीवन यापन के लिए भुगतान कर सके।चूंकि गर्मियों में बेरबेरी पकाई जाती थी, इसलिए महिला बेहद खुश हो जाती थी क्योंकि उसे आय का दूसरा और बेहतर स्रोत मिल जाता था, इसलिए वह जंगल में चली जाती थी और काफल से भरी बाल्टी को बाजार में बेचने के लिए उसे कम कर देती थी। परिवार की समस्याएं। एक बार ऐसा हुआ कि सुबह केसमय वह महिला काफल से भरी बाल्टी घर ले आई क्योंकि उसे अपने पशुओं के लिए कुछ चारा लाने जाना था और उसने शाम को अपने फल बेचने की सोची। उसने अपनी बेटी को बुलाया और उससे कहा कि वह अपनी आँखें फल पर रखे और जंगल से लौटने तक उन्हें न खाए। उसने छोटी बच्ची को जंगल से लौटने के बाद एक बार काफल खाने के लिए देने का भी वादा किया। मासूम बच्ची अपनी माँ की बातें सुनकर फलों पर नज़र रखने लगी, रसीला और फटा हुआ फल छोटी लड़की को आकर्षित करता रहा लेकिन उसने किसी तरह फल के लिए अपने मोह को नियंत्रित किया और इसी तरह जब माँ घर लौटी, काफल की बाल्टी दो तिहाई गायब हो गई और बगल में उसकी बेटी सो रही थी, यह देखकर थकी हुई मां ने तुरंत आग लगा दी और गुस्से से लाल हो गई। उसने महसूस किया कि अपनी बेटी को फल न खाने की चेतावनी देने के बाद भी उसने दो- तिहाई काफल खा लिया और आंख मिचमिचाते हुए गुस्से में मां ने जंगल से लाए घास के बंडल को फेंक दिया और पीठ पर एक जोरदार मुक्का मारा। अपनी सोती बेटी की, मुक्का इतना कठोर और क्रूर था कि छोटी बच्ची अपनी बेटी की हालत देखकर सोती हुई कोमा की स्थिति में चली गई, महिला ने अपने शरीर को हिलाकर छोटी बच्ची को होश में लाने की कोशिश की लेकिन विफल रही तब तक छोटी की मौत हो चुकी थी। अपने बच्चे को इस तरह मरता देख मां दिन भर सिसकियों में डूबी रही और शाम होते-होते बेबेरी ने फिर से अपने फटे हुए आकार को प्राप्त कर लिया।थोड़ी देर बाद जब महिला की नजर बाल्टी पर पड़ी तो उसने देखा कि सूरज की तेज रोशनी और उसकी गर्मी के कारण फल नीचे गिर गया था और शाम की हवा के कारण फल वापस अपने ताजा चेहरे पर आ गया था।

हाल ही में, माँ ने जो कुछ हुआ था, उसके लिए भारी मात्रा में अपराधबोध महसूस किया और वह भी अत्यधिक दुःख और दर्द के साथ चल बसीं। अपने बच्चे को इस तरह मरता देख मां दिन भर सिसकियों में डूबी रही और शाम होते-होते बेबेरी ने फिर से अपने फटे हुए आकार को प्राप्त कर लिया। थोड़ी देर बाद जब महिला की नजर बाल्टी पर पड़ी तो उसने देखा कि सूरज की तेज रोशनी और उसकी गर्मी के कारण फल नीचे गिर गया था और शाम की हवा के कारण फल वापस अपने ताजा चेहरे पर आ गया था।

ऐसा माना जाता है कि चैत के महीने में, उत्तर भारत में पारंपरिक हिंदू कैलेंडर के पहले महीने में, एक पक्षी भजन “काफल पाको मैं नी चख्यो” जिसका अर्थ है काफल फट गए, लेकिन मैंने उन्हें चखा नहीं किस दूसरे पक्षी को उत्तर “पुर्रे पुत्ती पुर्रे पुर” का अर्थ है वे पूर्ण बेटी हैं, वे पूर्ण हैं।दिल को दहला देने वाली यह कहानी न केवल दिल को छूती है बल्कि उत्तराखंड में काफल के महत्व पर भी जोर देती है। आज भी गर्मी के मौसम में कई परिवार इस फल को जंगल से तोड़कर बेचते हैं और अपनी जीविका चलाते हैं। कुमाऊँ के मधुर लोक संगीत में, यह वर्णित किया गया है कि कफ़ल देवताओं का फल था और कफ़ल अपना दुख” खना लायक  इंद्र का, हम छियां भूलोक आन पडान” के रूप में व्यक्त करते हैं, जिसका अर्थ है कि हम भगवान इंद्र द्वारा खाए जाने के लिए थे। स्वर्ग में लेकिन अब पृथ्वी पर चले गए। उत्तराखंड के जंगलों में पाया जाने वाला फल काफल कई औषधीय गुणों से भरपूर होता है। साथ ही रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने का काम भी करता है। जिस वजह से इसकी काफी डिमांड होती है। पाको मैनि चाखो पहाड़ के रसीले काफल पहुंचे, क्या आप जानते हैं इसके पीछे की कहानी? उत्तराखंड के जंगलों में पाया जाने वाला फल काफल कई औषधीय गुणों से भरपूर होता है। साथ ही रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने का काम भी करता है। जिस वजह से इसकी काफी डिमांड होती है। हल्द्वानी में भी जब काफल पहुंचा तो ग्राहक काफल का स्वाद लेने के लिए टूट पड़े।

जानिए काफल खाने के फायदे और इसके पीछे की मार्मिक कहानी “काफल पाको मैनि चाखो” पहाड़ के रसीले काफल पहुंचे हल्द्वानी, क्या आप जानते हैं इसके पीछे की कहानी? बीते वर्षों में काफल “काफल पाको चैता” के अनुसार चैत्र यानी मार्च-अप्रैल की बजाय दो माह पूर्व माघ यानी जनवरी-फरवरी माह में ही बाजार में आकर वनस्पति विज्ञानियों का भी चौंका रहा था, किन्तु इस वर्ष यह ठीक समय पर बाजार में आया था। गत दिनों 200 रुपऐ किग्रा तक बिकने के बाद इन दिनों यह कुछ सस्ता 150  रुपऐ तक में बिक रहा है। लेकिन बाजार में इसकी आमद बेहद सीमित है, और दाम इससे कम होने के भी कोई संभावनायें नहीं हैं। केवल गिने-चुने कुछ स्थानीय लोग ही इसे बेच रहे हैं। इसलिए यदि आप भी इस रसीले फल का स्वाद लेना चाहें तो आपको जल्द पहाड़ आना होगा।। यदि समय रहते हम नही सुधरे तो आने वाला दिन हमारे लिए खतरनाक हो सकता है। फल का अस्त्तित्व ही लगभग खत्म हो जाएगा।

(लेखक दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं)

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