उत्तराखंड (Uttarakhand) बनाने में आमजन की अहम भूमिका, किंतु जनमुद्दों के निस्तारण में विफल रही है अब तक की सभी सरकारें

उत्तराखंड (Uttarakhand) बनाने में आमजन की अहम भूमिका, किंतु जनमुद्दों के निस्तारण में विफल रही है अब तक की सभी सरकारें

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

उत्तराखंड को बनाने में आमजन की सीधी सहभागिता रही, इसमें हर वर्ग का संघर्ष रहा, लेकिन जब राज्य के बारे में सोचने व सरकारों के कार्यो के आकलन का मौका आया तो सभी सरकार से अपनी-अपनी मांगों को मनवाने में लग गए। ऐसा लग रहा है कि उत्तराखंड राज्य का गठन ही कम काम बेहतर पगार, अधिक पदोन्नति और ज्यादा सरकारी छुट्टियों, भर्तियों में अनियमितता व विभिन्न निर्माण कार्यो की गुणवत्ता में समझौता करने के लिए हुआ है। मानो विकास का मतलब विद्यालय व महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, अस्पतालों व मेडिकल कालेजों के ज्यादा से ज्यादा भवन बनाना भर है, न कि उनके बेहतर संचालन की व्यवस्था करना। हर साल सड़कें बनाना मकसद है, पर हर साल ये क्यों उखड़ रही हैं, इसकी चिंता न तो सरकारें करती हैं और न ही विपक्ष इस पर सवाल उठाता है। जाहिर है कि करोड़ों रुपये के निर्माण में लाभार्थी पक्ष-विपक्ष दोनों के अपने हैं।

अब सवाल यह उठता है कि उस वर्षगांठ को मनाने का औचित्य ही क्या है जिसमें उपलब्धियों व असफलताओं की बैलेंस सीट ईमानदारी से न खंगाली जाए। अब लोग भी यह पूछने लगे हैं कि अलग राज्य बनने के बाद ऐसा क्या हुआ जो उत्तर प्रदेश में ही रहते तो नहीं हो पाता। अगर कई जमीनी मुद्दों को सत्ताधारी नहीं देखते हैं या छिपाते हैं तो इसके कारण समझ में आते हैं, लेकिन विपक्ष की खानापूर्ति तो चिंता का कारण बनती है। जाहिर है कि इन सालों में जवाबदेह व्यवस्था नहीं बन पाई है। दोनों प्रमुख दलों ने प्रदेश को मुख्यमंत्री तो दिए, लेकिन जननेता नहीं। सत्ता के सिंहासन पर बारी-बारी से दल तो बदले, लेकिन तौर-तरीके नहीं। इन वर्षो में राज्य की राजधानी का मसला तक नहीं सुलझ पाया। आज राज्य के पास गैरसैंण में शीतकालीन राजधानी है व देहरादून में अस्थायी राजधानी। भावनाओं की कीमत पर जमीनी हकीकत से किनारा न किया गया होता तो 22 सालों में स्थायी राजधानी तो मिल ही गई होतीनौकरशाही का खामियाजा आमजन ने भुगता, लेकिन सत्ताधारी तो इसमें भी मुनाफा कमा गए। हर विफलता के लिए नौकरशाही को कोसने वाले सफेदपोश व्यक्तिगत स्तर पर लाभार्थी ही रहे हैं। जब उत्तर प्रदेश का विभाजन हुआ तो यह माना जाता रहा कि अब नवोदित उत्तराखंड राज्य की राजनीतिक संस्कृति भी अलग होगी, लेकिन यह हुआ नहीं।

आज भी उत्तराखंड उत्तर प्रदेश की ही राजनीतिक विरासत ढो रहा है। बस बाहुबल की राजनीतिक संस्कृति से काफी हद तक निजात मिली है, बाकी सारी तिकड़म की राजनीति वहां भी है और यहां भी। मतदाताओं के सामने खड़ी समस्याओं के समाधान से अधिक उनकी भावनाओं के दोहन की फिक्र रही है। कर्मचारी- शिक्षक सबसे बड़ा वोट बैंक बन कर उभरा है। स्थिति यह है कि आर्थिक स्थिति कैसी भी हो कर्मचारी-शिक्षक यूनियनों के सामने सरकारें नतमस्तक होती रही हैं।यही वजह है कि 22 साल बाद भी आर्थिक-औद्योगिक प्रगति केंद्र की अपेक्षित मदद के बाद भी गति नहीं पकड़ पाई। विकास जो हो रहा है वह पूरी तरह से केंद्र के भरोसे। पीएम का उत्तराखंड के प्रति सकारात्मक रुख के कारण ढांचागत विकास पर तेजी से काम हो रहा है, पर सवाल है कि इतने सालों में प्रदेश इनका लाभ लेने की स्थिति में भी पहुंचा या नहीं। पीएम का उत्तराखंड के प्रति सकारात्मक रुख के कारण ढांचागत विकास पर तेजी से काम हो रहा है, पर सवाल है कि इतने सालों में प्रदेश इनका लाभ लेने की स्थिति में भी पहुंचा या नहीं पलायन का मुख्य कारण पहाड़ के गांवों में आजीविका व रोजगार के अवसर न होना है। बेहतर भविष्य की आस में लोग शहरों की ओर भाग रहे हैं। यह ठीक है कि गांव में सभी को सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती, लेकिन रोजगार, स्वरोजगार के अवसर तो सृजित किए जा सकते हैं। इसके लिए विभिन्न स्वरोजगारपरक योजनाओं का लाभ युवा उठा सकते हैं, लेकिन इसके लिए सबसे पहले कौशल विकास पर ध्यान देना होगा। छोटे-छोटे उद्यमों को बढ़ावा देने के साथ ही यहां की परिस्थितियों के अनुसार खाद्य प्रसंस्करण जैसी इकाइयां स्थापित हो सकती हैं। स्वरोजगार के ज्यादा से ज्यादा अवसर सृजित हों, इसके तंत्र को अपनी जिम्मेदारी का ढंग से निर्वहन करना होगा। उद्यम स्थापना के मद्देनजर प्रक्रियागत खामियों को दूर कर इनका सरलीकरण करना होगा। यह भी देखने की जरूरत है कि युवा वर्ग क्या चाहता है, उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप योजनाओं को धरातल पर मूर्त रूप दिया जाना चाहिए।

प्रकृति ने उत्तराखंड को भरपूर नेमत दी हैं। ऐसे में पर्यटन के क्षेत्र में यह अपार संभावनाओं वाला प्रदेश है और इसमें पलायन को थामने की पूरी शक्ति है। होम स्टे जैसी योजनाएं इसमें कारगर हो सकती हैं, लेकिन यह भी देखना होगा कि सिर्फ होम स्टे खोल देने भर से काम नहीं चलेगा। इसके लिए कौशल विकास महत्वपूर्ण कड़ी है। स्मार्ट विलेज की अवधारणा को मूर्त रूप देना होगा। न सिर्फ होम स्टे, बल्कि पर्यटन से जुड़ी सभी गतिविधियों के लिए यह आवश्यक है। साथ ही सरकार को चाहिए कि वह पर्यटन विकास की योजनाओं की प्रभावी ढंग से मानीटरिंग सुनिश्चित करे। मूलभूत सुविधाओं के विस्तार और रोजगार-स्वरोजगार की योजनाओं की राह में उलझनें भी कम नहीं हैं। मैदानी और पहाड़ी भूगोल को ध्यान में रखते हुए योजनाओं के निर्माण का विषय अभी भी बना हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि जो भी योजनाएं बनें, वे गांव व व्यक्ति केंद्रित हों। इनमें स्थानीय समुदाय की भागीदारी हो, जैसा वह चाहता है उसी हिसाब से योजनाएं बननी चाहिए। इसके साथ ही पर्यावरणीय समेत अन्य कारणों के समाधान को भी गंभीरता के साथ कदम उठाने होंगे।

जवाबदेही का विषय अक्सर चर्चा के केंद्र में रहता है। समग्र रूप में देखें तो तंत्र की बेपरवाही गांवों के विकास और वहां मूलभूत सुविधाओं के विस्तार के मामले में भारी पड़ रही है। इस दृष्टिकोण से राजनीतिज्ञों के साथ ही नौकरशाहों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। कुछ हुआ तो पहाड़, मैदान के बीच की खाई और अधिक चौड़ी हुई। सारे उद्योग-धंधे, बड़े शैक्षणिक संस्थान, अस्पताल मैदानी भाग में ही अटक गए। शिक्षक-डॉक्टर भी पहाड़ नहीं चढ़ पाए और पहाड़ यूपी की तरह ही मैदानों को देखता और खुद भी पानी और जवानी के साथ पलायन कर उसमें समाता चला गया, और नए परिसीमन से राज्य विधानसभा में उसकी भागेदारी भी घटकर निष्प्रभावी हो गई। सोच में बदलाव लाते हुए तंत्र को जवाबदेह बनाना होगा। जिस विभाग का जो कार्य है, उसे वह पूरी जिम्मेदारी से पूर्ण करे। गांवों की तरक्की के लिए सोच में बदलाव हर स्तर पर जरूरी है।

(लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरतहैं)

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