पहाड़ में मंडी नहीं तो कैसे होगी किसानों की आय दोगुनी

पहाड़ में मंडी नहीं तो कैसे होगी किसानों की आय दोगुनी

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

सरकार किसानों की आय दोगुनी करने की बात करती है लेकिन भीमताल, रामगढ़, ओखलकांडा, धारी और बेतालघाट के पर्वतीय क्षेत्रों में अब तक मंडी की स्थापना न होने से काश्तकार अपनी फसलों व फलों को बिचौलियों के माध्यम से हल्द्वानी मंडी में औने-पौने दामों पर बेचने को मजबूर हैं। कृषि मंत्री धारी या ओखलकांडा के मध्य मंडी खोलने की घोषणा काफी पहले कर चुके हैं लेकिन उद्यान विभाग को अब तक भूमि नहीं मिली है। अफसोस है कि मंडी खुलने का सपना धरातल पर नहीं उतर सका है। उद्यान विभाग की ओर से मल्ला रामगढ़ में 50 लाख का कोल्ड स्टोरेज खोला है लेकिन अधिकतर समय कोल्ड स्टोरेज में ताला लगा होने से किसानों को अपनी उपज को सुरक्षित रखने में परेशानी होती है।

भीमताल, धारी, रामगढ़, ओखलकांडा और बेतालघाट क्षेत्र में एक-दो छोटी और बड़ी मंडी भी खुलती तो किसानों को अपने उत्पादों को उचित दाम पर बेचने का एक प्लेटफार्म मिलता। साथ ही किसानों को बिचौलियों से छुटकारा मिलने के साथ वाहनों का अतिरिक्त किराया नहीं देना पड़ता। इस घाटी में फल, सब्जी एवं परंपरागत फसलों का अच्छा उत्पादन होता है। लेकिन, प्रत्येक सीजन के दौरान काश्तकारों को उनकी फसलों के उचित दाम नहीं मिल पाते हैं, जिससे पूरे सालभर की मेहनत पर पानी फिर जाता है। सेब किसानों को उचित दाम ना मिलने के पीछे एक बड़ी वजह यह भी है कि राज्य में सेब का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित नहीं हुआ है। इसके अलावा मंडी व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी है। व्यापारियों की मनमानी है। इन मुद्दों पर धारी रामगढ़ क्षेत्र के किसानों ने कैबिनेट मंत्री  को किसानों ने सरकार से एमएम सेब के बॉक्स सब्सिडी पर उपलब्ध कराने और पारदर्शी तरीके से सेब की खरीद शुरू कराने की मांग की है।

भवाली स्थित फ्रूटेज इंडिया फ्रूट प्रोसेसिंग कंपनी के बताते हैं कि सघन तकनीक से उगाए जाने वाले नई विदेशी प्रजाति के सेबों की वजह से भी बाजार में स्थानीय किस्मों के सेब की मांग में गिरावट है। वहीं, अब हिमाचल प्रदेश का सेब जो अपने आकार और लाली के लिए मशहूर है, बाजार में आना शुरू हो गया है। इससे भी स्थानीय सेब की मांग घटी है।रामगढ़ और धारी क्षेत्र के अधिकांश काश्तकार स्थानीय प्रजाति के सेब उगाते हैं। उदाहरण के लिए भूरा डिलिशियस पकने के बाद भी हल्के भूरे रंग का होता है। मंडी में व्यापारी इसे कच्चा कहकर सेब खरीद नहीं रहे हैं। दूसरी समस्या यह है कि स्थानीय प्रजाति के सेब का आकार विदेशी किस्मों के तुलना में छोटा होता है। इनका वजन 100 ग्राम से कम रहता है। इस आधार पर यह ‘सी ‘ ग्रेड की श्रेणी में आता है।

रामगढ़ क्षेत्र के सूपी गांव के किसान  बताते हैं कि उन्होंने जुलाई महीने के आरंभ से लेकर अब तक 1500 पेटी सेब हल्द्वानी मंडी भेजा, जिनका उन्हें 200-500 रुपये प्रति पेटी मिला। लेकिन अब भाव में मंदी आ गई है। हल्द्वानी मंडी में आढ़तियों ने सेब न भेजने के लिए कहा है। उनकी तरह क्षेत्र के बहुत काश्तकारों ने अब सेब पेड़ से तोड़ने बंद कर दिए हैं। मंडी में मांग ना होने से किसानों के पास सेब के ढेर लगे हैं। सरकार को सेब की पारंपरिक किस्मों के संवर्धन के लिए नीति बनाने पर ध्यान देना चाहिए। सघन तकनीकी से सरकारी योजनाओं के माध्यम से जो सेब उगाया जा रहा है, उसकी वजह से भी स्थानीय किस्मों के सेब की मांग घटी है। सघन तकनीक से उत्पादन में कीटनाशक, दवाइयां, स्प्रे और अत्यधिक देखरेख की आवश्यकता होती है। आकर और रंग में यह सेब अच्छे होते हैं। रेट भी ठीक मिल जाता है लेकिन उतने स्वादिष्ट नहीं होते।

उदाहरण के लिए कल भवाली मंडी में हॉलैंड सेब की एक पेटी 1250 रुपये की बिकी। जबकि स्थानीय प्रजाति के सेब को मंडी में 8-12 रुपये किलो का रेट भी मुश्किल से मिल रहा है। आंकड़ों में उत्तराखंड की प्रति व्यक्ति आय भले ही देश से ज्यादा हो लेकिन पहाड़ आज भी उस विकास को तरस रहा है जिसके लिए अलग राज्य का आंदोलन किया गया था और जिस विचार के साथ उत्तराखंड का गठन हुआ था। हकीकत यह है कि राज्य की प्रतिव्यक्ति आय तो बढ़ रही है लेकिन  विकास में पहाड़ पिछड़ रहा है। उत्तराखंड में प्रति व्यक्ति आय यानि एक आदमी की सालाना कमाई 1,90,284 रुपये है जबकि देश की प्रति व्यक्ति आय 1,25,397 है। इसका अर्थ यह हुआ कि आंकड़ों में उत्तराखंड का निवासी देश के बाबकी निवासियों के मुकाबले 64,887 रुपये ज़्यादा कमाता है।

रिपोर्ट के मुताबिक इस आंकड़े में बड़ा योगदान राज्य के 4 मैदानी जिलों का है। कमाल की बात यह है कि राज्य की दोनों प्रमुख पार्टियां यह स्वीकार करते हैं कि राज्य बनने के 23साल में मैदानी ज़िलों में उद्योगों का उत्पादन भी बढ़ा है और आबादी का बोझ भी। पहाड़ी जिलों में रहने वाले लोग प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े से खुश तो हो सकते हैं लेकिन पहाड़ की राजनीति करने वाले विधायक ही मानते हैं कि आज भी पहाड़ पिछड़ा हुआ है। विधायक कहते हैं कि पहाड़ी नेताओं को भी मैदान ज़्यादा पसंद आता है.आंकड़ों के खेल में कमाई भी अच्छी लगती है और विकास भी लेकिन हकीकत के धरातल पर ये आंकड़े विरोधाभासी दिखते हैं। पहाड़ी राज्य कहे जाने वाला उत्तराखंड आज भी शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र में संघर्ष कर रहा है।

ऐसे में प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े दिल बहलाने का एक अच्छा ख्याल भर लगते हैं। लेकिन जब सब जगह से फल पक कर तैयार हुए, तो देश भर से आने वाले व्यापारी हल्द्वानी मंडी में नहीं पहुंच रहे हैं। इसके पीछे क्या वजह है उसके समाधान के लिए बागवानी विभाग, मंडी समिति एवं किसानों के साथ व्यापारियों को एक मंच पर बैठाकर इसका हल खोजने की जरूरत है।जिस राज्य में हिमाचल की तर्ज पर फल और सब्जी हो सकती थी, वहां संपन्नता का आधार सरकारी कर्मचारियों की पोस्टिंग, ट्रांसफर, खनन और शराब का व्यापार रखा गया। पहले मुख्यमंत्री हरियाणा मूल के थे और दूसरे जो पर्वतीय मूल के थे, उन्हें पर्वत पसंद नहीं थे। लिहाजा वो अपने कार्यकाल में कभी पहाड़ चढ़े भी नहीं। विकास की गंगा ऊपर से नीचे बही और गांव पलायन से खाली होते गये। जो सेब हिमाचल में उगता है, उसको उगने के लिये जो परिस्थिति चाहिये, वो उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में है। बहरहाल, उत्तराखंड भी उस दिन का इंतजार कर रहा है, जब कोई मुख्यमंत्री से भाषण देते हुये कहेगा कि, अब उत्तराखंड में खनन और शराब नहीं, बल्कि बल्कि सेब पैदा होगा।

( लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं )

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