हिंदी (Hindi) भारत की राष्ट्रीय भाषा है

हिंदी (Hindi) भारत की राष्ट्रीय भाषा है

डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

इतिहास के पन्नो में आज का दिन बेहद खास है। आज यानी 14 सितंबर ही वो तारीख है जब साल 1949 में ‘हिंदी’ को भारत की राजभाषा का दर्जा मिला। आइये जानते हैं कैसे बनी हिंदी हमारी राजभाषा। आजादी के बाद भारत की राजभाषा का मुद्दा सबसे अहम और विवादित था। विवादित इसलिए क्योंकि भारत में सैकड़ों भाषाएं और बोलियां बोली जाती हैं, ऐसे में राजभाषा का दर्जा किसे दिया जाए ये सवाल अहम था। काफी सोच- विचार के बाद संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी ‘हिंदी’ को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकारा। 14 सितंबर 1949 को सर्वसम्मति से संविधान सभा ने इसपर मुहर लगा दी। तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस दिन के महत्व को देखते हुए 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाए जाने सलाह दी। पहला हिंदी दिवस साल 1953 में मनाया गया।

भारत विविधताओं से भरा एक देश है। यहां कई धर्म, जाति, संप्रदाय के लोग रहते हैं। इनमें से हर एक की बोली अलग-अलग है, लेकिन इन सबमें हिंदी देश के सबसे अधिक राज्‍यों में बोली जाने वाली भाषा है।भारत के बाहर पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, न्यूजीलैंड, संयुक्‍त अरब अमीरात, युगांडा, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद, मॉरीशस और दक्षिण अफ्रीका सहित कई अन्‍य देशों में हिंदी बोलने का चलन है।देश में हिंदी का भले ही कितना बोलबाला हो, लेकिन यह हमारी राष्‍ट्रभाषा नहीं है। हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्‍त है। इसे हम देश का आफिशियल लैंग्‍वेज नहीं बोल सकते हैं। हालांकि, देश में इसे बोलने वालों की संख्‍या अधिक है और इसके लगभग हर कोने में हिंदी बोलने वाला या समझने वाला कोई न कोई जरूर मिल जाता है।

वहीं, बात करें दुनिया की, तो मंडेरिन, स्पेनिश और अंग्रेजी भाषा के बाद हिंदी दुनिया में चौथी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। ऐसे में हिंदी के महत्व को लोगों तक पहुंचाने और इसे बढ़ावा देने के मकसद से हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है।लेकिन भाषा को लेकर एकरूपता की समस्या खत्म नहीं हुई हिंदी भाषा राजनीति की शिकार होती रही है और भारत को अभी तक एक राष्ट्रभाषा नहीं मिली। आज भारतीय संविधान में 14 से 22 राजभाषाएं हो गई हैं। हिंदी का उपयोग अधिकांश हिस्सों में सुचारू रूप से चलता है। हिंदी को राष्ट्रीय भाषा घोषित करने की मांग भी होती है। लेकिन अभी तक देश को उसकी राष्ट्रभाषा का इंतजार है।

भारत विविधताओं को देश है। एकता में अनेकता का संदेश देता यह देश अपनी संस्कृति और परंपराओं के लिए दुनियाभर में अलग पहचान रखता है। यहां कई भाषाएं और बोलियां प्रचलित हैं। लोग यहां अपनी सुविधा और संस्कृति के हिसाब से भाषा का चुनाव करते हैं। भारत में यूं तो कई भाषाएं बोली जाती हैं, लेकिन हिंदी एक ऐसी भाषा है, जो देश में सबसे ज्यादा बोली जाती है। साल 2011 में हुई जनगणना के मुताबिक देश में करीब 43.63 फीसदी लोग हिंदी का इस्तेमाल करते हैं। ज्यादातर भारतीयों की मातृभाषा हिंदी भले ही देश की राष्ट्रभाषा न बन पाई हो, लेकिन बावजूद इसके हिंदी देश के आधे से ज्यादा भाग को जोड़ती है। आजादी की लड़ाई के समय भी एक राष्ट्र एक भाषा की भी मांग उठती रहती थी। कई नेताओं ने हिन्दी को देश की संपर्क भाषा बनने के काबिल माना क्योंकि पूरे उत्तर भारत के अलावा पश्चिम भारत के ज्यादातर राज्यों में भी हिन्दी भाषा को ही बोला और समझा जाता था। मगर दक्षिण भारतीय राज्यों और पूर्वोत्तर के राज्यों के लिए हिन्दी एक परायी भाषा थी।

यही कारण है कि आजादी के तुरंत बाद ही हिन्दी को देश की राजभाषा घोषित नहीं किया गया था। संविधान के अनुच्छेद 351 के तहत हिन्दी को अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों के रूप में विकसित और प्रचारित करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है। उस समय यह सोच थी कि सरकार हिन्दी का प्रचार-प्रसार करेगी और जब पूरे देश की सहमति होगी, तब हिंदी को राजभाषा घोषित किया जाएगा। जब अंग्रेजी भाषा को आधिकारिक भाषा के तौर पर हटने का समय आया, तोदेश के कुछ हिस्सों में इसको लेकर भी विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए। सबसे ज़्यादा दक्षिण भारतीय राज्यों में हिंसक प्रदर्शन हुए और तमिलनाडु में जनवरी सन् 1965 में भाषा विवाद को लेकर दंगे तक भड़क उठे। उसके बाद केंद्र सरकार ने संविधान में संशोधन किया और अंग्रेजी को हिन्दी के साथ भारत की आधिकारिक भाषा बनाए रखने का प्रस्ताव पारित किया।

आधिकारिक भाषा के अलावा आज भारत के संविधान की 8वीं अनुसूची में 22 भाषाएं शामिल हैं।आपको बता दें राष्ट्रीय हिंदी दिवस 14 सितंबर को और विश्व हिंदी दिवस 10 जनवरी को मनाया जाता है। हिन्दी भाषा को सम्मान दिलाने के लिए ही हर साल हिन्दी दिवस मनाया जाता हैताकि हिन्दी भाषा का अधिक से अधिक उत्थान हो सके और भविष्य में यह भारत की राष्ट्रभाषा भी बन सके। बहुत सी जगहों पर तो हिन्दी दिवस का जश्न पूरे एक हफ्ते तक मनाया जाता है, जिसे हिन्दी पखवाड़ा कहा जाता है। हिन्दी भाषा का स्थान पूरी दुनिया में बोली जाने वाली भाषाओं में तीसरे नंबर पर आता है। इस दिन की खुशी को स्कूलों से लेकर ऑफिसों तक में मनाया जाता है। आज हिंदी पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में से एक बन गई है। अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए धीरे-धीरे लोगों के दिलों में हिंदी के प्रति सम्मान बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है और हिंदी को लेकर उनकी सोच भी बदल रही है।

हिंदी अब लोकप्रिय भाषा बनती जा रही है। हिन्दी भाषा को अब पूरे विश्व भर में सम्मान की नजरों से देखे जाने की कोशिश की जा रही है और पसंद भी किया जा रहा है। विश्व की सबसे बड़ी कंपनियां जैसे गूगल, फेसबुक आदि भी हिंदी को बढ़ावा देने का काम रही हैं।हिंदी हैं हम, वतन हिंदोस्तां हमारा। यह पंक्ति हम हिंदुस्तानियों के लिए अपने आप में एक विशेष महत्व रखती है। हिंदी अपने देश हिंदुस्तान की पहचान है। यह देश की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है इसीलिए हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। हिंदी भाषा के महत्व को बढ़ावा देना है। इस दिन के अवसर पर स्कूलों, कॉलेजों, सरकारी कार्यालयों, और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर कई तरह के हिंदी सम्मलेन और प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती है जिससे की लोगों में हिंदी भाषा की अपनी मातृभाषा के प्रति गहरा सम्मान और प्रेम बढ़ा सकें।हिंदी दिवस पर लोग अपनी सारी बातें हिंदी में कहने का प्रयास करते हैं और भाषा के सजीव रूप को सजाने का प्रयास करते हैं। इस दिन को मनाकर, हम हिंदी भाषा के महत्व को और भी मजबूत बनाते हैं और देश की एकता और विविधता को बढ़ावा देते हैं।

हिंदी दिवस के हमें यह याद दिलाता है कि हिंदी भाषा हमारे सांस्कृतिक और राष्ट्रीय धरोहर का हिस्सा है,और हमें इसका संरक्षण करना हमारी जिम्मेदारी है। इसलिए, हिंदी दिवस हमें हिंदी भाषा के महत्व को समझने और प्रसारित करने का मौका प्रदान करता है और हमें हमारे राष्ट्रीय भाषा के प्रति अपनी सच्ची स्नेहभावना का प्रदर्शन करने का अवसर देता है।सशक्त भारत-निर्माण के लिए भारतीय भाषाओं के प्रयोग की प्रासंगिकता व्यक्त करते हुए कहा कि जब अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले राज्यों के लोग आपस में बातचीत करें तो उन्हें अंग्रेजी की बजाय हिन्दी को या देश की ही किसी अन्य भाषा को इसका माध्यम बनाना चाहिए।ज् निश्चित ही बातचीत एवं व्यवहार की भाषा के रूप में हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं का प्रयोग करने से राष्ट्रीय विकास के नए क्षितिज खुलेंगे, नवाचार के नए-नए आयाम उभरेंगे। भारतीय भाषाओं में बातचीत, व्यवहार, चिंतन एवं शिक्षण से सृजनात्मक एवं स्व- पहचान की दिशाएं उद्घाटित होंगी।

वास्तव में स्व-भाषाएं विचारों, विचारधाराओं, कल्पनाओं और अपने व्यापक सामाजिक-राष्ट्रीय दर्शन की स्पष्टता का माध्यम बनती हैं। प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति घोषित करते हुए मातृभाषा एवं क्षेत्रिय भाषाओं को प्रतिष्ठापित करने का अनूठा उपक्रम किया जा रहा है। इसको लेकर देश में मातृभाषा एवं क्षेत्रीय भाषाओं को प्रोत्साहन देने एवं इन्हीं भाषाओं में उच्च शिक्षा दिये जाने एवं राजकाज में उनका उपयोग किये जाने की स्थितियां निर्मित होने लगी हैं, जो एक शुभ-संकेत है, आजादी का अमृत महोत्सव मनाते हुए स्वभाषा का सम्मान अनूठा उपक्रम है। अब हिन्दी को राजभाषा ही नहीं बल्कि राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठापित किये जाने की अपेक्षा है। एक भाषा के रूप में हिंदी न सिर्फ भारत की पहचान है बल्कि यह हमारे जीवन मूल्यों, संस्कृति एवं संस्कारों की सच्ची संवाहक, संप्रेषक और परिचायक भी है। बहुत सरल, सहज और सुगम भाषा होने के साथ हिंदी विश्व की संभवतः तीसरी सर्वाधिक प्रयोग में आने वाली सबसे सशक्त वैज्ञानिक भाषा है। जो हमारे पारम्परिक ज्ञान, प्राचीन सभ्यता और आधुनिक प्रगति के बीच एक सेतु भी है।

हिंदी को बहुत से लोग राष्ट्रभाषा के रूप में देखते हैं। राष्ट्रभाषा से अभिप्राय है किसी राष्ट्र की सर्वमान्य भाषा। क्या हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है? यद्यपि हिंदी का व्यवहार संपूर्ण भारतवर्ष में होता है, लेकिन हिंदी भाषा को भारतीय संविधान में राष्ट्रभाषा नहीं कहा गया है। चूँकि भारतवर्ष सांस्कृतिक, भौगोलिक और भाषाई दृष्टि से विविधताओं का देश है। इस राष्ट्र में किसी एक भाषा का बहुमत से सर्वमान्य होना निश्चित नहीं है इसलिए भारतीय संविधान में देश की चुनिंदा भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में रखा है। शुरू में इनकी संख्या 16 थी, जो आज बढ़ कर 22 हो गई है। ये सब भाषाएँ भारत की अधिकृत भाषाएँ हैं, जिनमें भारत देश की सरकारों का काम होता है। भारतीय मुद्रा नोट पर 16 भाषाओं में नोट का मूल्य अंकित रहता है और भारत सरकार इन सभी भाषाओं के विकास के लिए संविधान अनुसार प्रतिबद्ध है।वर्तमान समय में हिन्दी एवं मातृभाषाओं का महत्व एवं उपयोग अधिक प्रासंगिक हुआ है। क्योंकि सर्वतोमुखी योग्यता की अभिवृद्धि एवं स्व-पहचान के बिना युग के साथ चलना और अपने आपको टिकाए रखना अत्यंत कठिन होता है।

नई शिक्षा नीति ने इस बात को गंभीरता से स्वीकारा है, निश्चित ही यह भारत को एक ज्ञानमय समाज में रूपांतरित करने वाली सफल योजना साबित होगी। हमारे पास आज दुनिया तक पहुंचने का शानदार सु-अवसर है जो अब से पहले शायद कभी नहीं था।हमारे पास आज ऐसा नेतृत्व है, जो इन तमाम बदलावों को साकार करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ है। हमें सिर्फ सकारात्मक प्रयासों के साथ सही दिशा में बढ़ने एवं मातृभाषा एवं स्वभाषा में शिक्षण को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। हमारा देश दुनिया का सबसे युवा देश है। अपनी इस युवा जनशक्ति का सदुपयोग कर हम महाशक्ति बनने की दिशा में सार्थक हस्तक्षेप कर सकते हैं। अपने युवाओं को नये कौशलों और नये ज्ञान से लैस कर दुनिया में परचम लहरा सकते हैं। जिसमें स्वभाषा, स्व-संस्कृति एवं स्व-पहचान की सार्थक भूमिका है।

भारत सुपर पावर बनने के अपने सपने को साकार कर सकता है। इस महान उद्देश्य को पाने की दिशा में विज्ञान, तकनीक और अकादमिक क्षेत्रों में नवाचार और अनुसंधान करने के अभियान को तीव्रता प्रदान करने के साथ मातृभाषाओं एवं हिन्दी में शिक्षण एवं राजकाज में उपयोग को प्राथमिकता देना होगा। हिन्दी एवं मातृभाषाओं के प्रति प्रतिबद्धता के साथ नए भारत के निर्माण का आधार प्रस्तुत करना होगा, इससे नव-सृजन और नवाचारों के जरिए समाज एवं राष्ट्र में नए प्रतिमान उभरेंगे।हिन्दी एवं मातृभाषाएं सम्पूर्ण देश में सांस्कृतिक और भावात्मक एकता स्थापित करने का प्रमुख साधन है। भारत का परिपक्व लोकतंत्र, प्राचीन सभ्यता, समृद्ध संस्कृति तथा अनूठा संविधान विश्व भर में एक उच्च स्थान रखता है, उसी तरह भारत की गरिमा एवं गौरव की प्रतीक हिन्दी एवं मातृभाषाओं को हर कीमत पर विकसित करना हमारी प्राथमिकता होनी ही चाहिए।

प्रधानमंत्री के शासन में हिन्दी सहित न्य क्षेत्रीय भाषाओं को सरकारी कामकाज, स्कूलों, कॉलेजों, तकनीकी शिक्षा में प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए, इस दिशा में वर्तमान सरकार के प्रयास उल्लेखनीय एवं सराहनीय हैं, लेकिन उनमें तीव्र गति दिये जाने की अपेक्षा है। क्योंकि इस दृष्टि से महात्मा गांधी की अन्तर्वेदना को समझना होगा, जिसमें उन्होंने कहा था कि भाषा संबंधी आवश्यक परिवर्तन अर्थात हिन्दी को लागू करने में एक दिन का विलम्ब भी सांस्कृतिक हानि है। मेरा तर्क है कि जिस प्रकार हमने अंग्रेज लुटेरों के राजनैतिक शासन को सफलतापूर्वक समाप्त कर दिया, उसी प्रकार सांस्कृतिक लुटेरे रूपी अंग्रेजी को भी तत्काल निर्वासित करें। लगभग 75 वर्षों के आजाद भारत में भी पूर्व सरकारों की उपेक्षापूर्ण नीतियों के कारण हिन्दी एवं क्षेत्रीय भाषाओं को उनका गरिमापूर्ण स्थान न दिला सके, यह विडम्बनापूर्ण एवं हमारी राष्ट्रीयता पर एक गंभीर प्रश्नचिन्ह है।

कबीर का गायन है हिंदी
सरल शब्दों में कहा जाए
तो जीवन की परिभाषा है हिंदी

हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं! ये लेखक के अपने विचार हैं।

(लेखक दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं )

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