चेना एक ऐसा मोटा अनाज

चेना एक ऐसा मोटा अनाज

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

चीना को बहुत से नामों से जाना जाता है। इसकी खेती भारत में बहुत पहले से की जाती रही है। भारत में विभिन्न राज्यों में इसे अलग-अलग नामों से पहचाना जाता है। पंजाब और बंगाल में इसे चीना, तमिलनाडु में इसे पानी वारागु, महाराष्ट्र में इसे वरी, गुजरात में इसे चेनो तो कर्नाटक में इसे बरागु नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार अन्य राज्यों में भी वहां की भाषा के अनुसार इस फसल के अलग-अलग नाम है। चीना को मोटे अनाज की श्रेणी में रखा गया है। इसका पौधा 45-100 सेंटीमीटर की ऊंचाई तक बढ़ता है। तना सूजे हुए गांठों के साथ पतला होता है। इसकी जड़ें रेशेदार और उथली हुई होती है। इसका बीज मलाईदार सफेद, पीले, लाल या काले रंग के हो सकते हैं।

वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। मोटे अनाज के तहत ज्वार, बाजरा, रागी, कंगनी, चीना, कोदो, कुटकी और कुट्‌टू आदि को शामिल किया गया है। मोटे अनाज की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए इनके बीज किसानों को सब्सिडी पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। कई जगहों पर मोटे अनाज के फ्री बीज (वितरित किए जा रहे हैं।  मोटे अनाज की खेती  से किसान को ही नहीं, आम लोगों को भी लाभ होगा। मोटे अनाज में कई प्रकार के प्रोटीन और पोषक तत्व होते हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होते हैं। कई रोगों को दूर करने में भी यह सहायक हैं। इसकी खेती भारत में मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र बिहार, कर्नाटक आदि राज्यों में की जाती है।

चीना एक मोटा अनाज है जिससे भात, रोटी और खीर बनाई जाती है। यह पोषक तत्वों से भरपूर होता है। इसमें प्रति 100 ग्राम 13.11 ग्राम प्रोटीन एवं 11.18 ग्राम फाइबर के अलावा काफी मात्रा में लोहा और कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है। इसके सेवन से ब्लड प्रेशर एवं मधुमेह रोग में आराम मिलता है। इसे भिगोकर, सुखाकर एवं भूनकर खाया जा सकता है। इसके सेवन से शरीर में खून की कमी दूर होती है। यह पचने में आसान होता है तथा इसके सेवन से काफी समय तक भूख नहीं लगती है। इसलिए यह शरीर का वजन घटाने में भी मददगार वैसे तो चीना की फसल को बहुत कम सिंचाई की आवश्यकता होती है। लेकिन कुछ फसल की मुख्य अवस्थाएं होती है जिनमें सिंचाई करना बेहद जरूरी होता है। इससे कल्लों की संख्या में बढ़ोतरी होती है।

खरीफ सीजन में बोई जाने वाली चीना की फसल में कल्ले निकलने की अवस्था में सिंचाई अवश्य करें। इसके अलावा यदि सूखा मौसम अधिक रहता है यदि उन्नत कृषि तकनीकों का इस्तेमाल किया जाए तो चीना की प्रति हैक्टेयर 12-15 क्विंटल अनाज के रूप में प्राप्त की जा सकती है। वहीं इससे 20-25 क्विंटल तक भूसा भी प्राप्त किया जा सकता है जिसका उपयोग पशु चारे के लिए किया जा सकता है। आमतौर पर मोटा अनाज चीना का बाजार भाव 4800 रुपए से 5,000 रुपए प्रति क्विंटल तक होता है।यदि किसान इसकी खेती करें तो दो महीने में काफी अच्छा पैसा कमा सकते हैं। इससे खेत खाली छोड़ने की समस्या भी खत्म होगी और कम पानी में बेहतर उत्पादन मिल जाएगा। कभी उत्तर प्रदेश का अंग रहे इस हिमाचली राज्य को बनाने के लिए शुरू हुए जनांदोलनों में ‘कोदा झंगोरा खाएंगे, उत्तराखंड बनाएंगे’ का नारा जन जन की जुबान पर था। राज्य गठन का वह स्वप्न तो साकार हुआ ही, कोदा, झंगोरा को राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय पहचान भी मिल गई।

जिस मोटे अनाज को कभी गरीबों का खाना कहा जाता था वही आज अमीरों की थाली की शान बन रहा है। अब इसके गुणों को लोग पहचानने लगे हैं। स्वास्थ्य के दृष्टिकोण व अन्य उपयोग जैसे पशु-चारा आदि के तौर पर इसकी उपयोगिता बढ़ती जा रही है। मोटे अनाज में औषधीय गुण भी पाए जाते हैं। मोटे अनाज की खेती करने के लिए सिंचित भूमि की आवश्यकता नहीं पड़ती। पहाड़ी इलाकों के ऊंचाई वाले इलाकों में सिंचाई के साधन न होने के कारण मंडुआ, झंगोरा आदि की खेती अधिक की जाती है। मैदानी इलाके जहां केवल बारिश पर ही निर्भर रहना पड़ता है वहां ज्वार-बाजरा, रागी जैसे मोटा अनाज की खेती की जाती है। मार्च 2021 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा भारत की ओर से पेश वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष’ (इंटरनेशनल मिलेट्स ईयर) घोषित करने के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया। जिसे 70 देशों से अधिक का समर्थन मिला।

भारत सरकार मोटे अनाज के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए बढ़-चढ़कर प्रचार-प्रसार कर रही है। इसको बढ़ावा देने के लिए श्री अन्न योजना शुरु की गयी है साथ ही देश के विभिन्न भागों में इससे संबंधित महोत्सवों का आयोजन किया जा रहा है। हिमालयी राज्य के परंपरागत मोटे अनाजों की पौष्टिकता व गुणवत्ता उच्चस्तर की है। दक्षिण के बाद उत्तर भारत में स्थानीय अनाज, उनसे बनी डिश व अन्य पकवानों पर किए गए अनूठे शोध ने उपेक्षा से बेजार मोटे अनाजों की महत्ता बढ़ा दी है। स्वाद और ऊपरी चमक-दमक की वजह से चलन से बाहर होने की कगार पर खड़े मोटे अनाज (Millets) की डिमांड पिछले तीन वर्षों में दोगुना बढ़ गई है। परंतु राज्य गठन के 23 वर्ष बाद भी सरकार और विभागीय प्रयास रकबा बढ़ा पाने में नाकाम रहे हैं।

( लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं ) 

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